अधिकाधिक सम्पति का संचय, शिक्षा का ध्येय नहीं

 

"शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य अधिक बल एवं ज्ञान अर्जन करने तक सीमित नहीं, बल्कि उस बल और ज्ञान के द्वारा समृद्ध, सभ्य और स्वस्थ  समाज का निर्माण है ।" 

                                                                                                - अल्बर्ट आइंस्टीन

लौकिक शिक्षा का मुख्य ध्येय अधिकाधिक सम्पति का संचय करना नही वरन व्यक्ति के सम्पूर्ण विकास को प्रोत्साहित करना होता है, जो उसे न केवल अधिकाधिक ज्ञान और विज्ञान में समर्थ बनाता है, बल्कि सही तरीके से सोचने, समझने, संवाद करने, नैतिक मूल्यों को समझकर उनको विकसित करने, समस्याओं का समाधान करने, समाज में अपना योगदान देने, और समृद्ध, सात्विक और स्वस्थ राष्ट्र के निर्माण में मदद करे ।

शिक्षा के माध्यम से विद्यार्थियों को न केवल शैक्षणिक ज्ञान की प्राप्ति होती है बल्कि आगे बढ़ने का सामर्थ्य भी मिलता है ।  लौकिक शिक्षा शारीरिक, बौद्धिक, नैतिक, भावनात्मक, और सामाजिक विकास का भी माध्यम है। इस प्रकार, शिक्षा एक व्यक्ति के भीतरी और बाह्य विकास का मिश्रित स्वरुप है जो उसे समृद्ध, और सफल जीवन जीने में मदद करती है।

लौकिक शिक्षा एक व्यक्ति को अपने करियर में सफलता प्राप्त करने के लिए अवसर प्रदान  करती है और आवश्यक भी है, लेकिन इसका अर्थ सिर्फ सम्पत्ति का संचय करना नहीं है। शिक्षा उसे समझदार, सजग, जिम्मेदार, नैतिकता प्रिय, और समाजसेवी व्यक्ति बनाती है और ऐसा ना होने पर उस व्यक्ति की शिक्षा केवल मात्र कागजों तक सिमित रह जाती है । 

एक शिक्षित व्यक्ति स्वयं के जीवन एवं परिवार को उचित तरीके से गढ़ता है और समाज में सक्रिय रूप से भाग लेता है, समस्याओं का समाधान चाहता भी है तो उसके लिए आवश्यक प्रयास भी करता है, सामाजिक परिवर्तन के लिए आगे आता है, और अपने व्यक्तिगत जीवन में समृद्धि और संतुष्टि को प्राप्त करता है।

माहात्मा गांधी ने कहा है कि, "शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य व्यक्ति को ज्ञान के साथ-साथ जीवन के मूल्यों और नैतिकता की पहचान करने में मदद करना है।" 

शिक्षा का ध्येय अधिकाधिक सम्पति का संचय करना नहीं, बल्कि व्यक्ति के सम्पूर्ण विकास को समर्थ एवं सार्थक करना है, जो उसे एक स्वस्थ समाज का निर्माण करने की प्रेरणा दे ।


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