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Showing posts from July, 2023

अधिकाधिक सम्पति का संचय, शिक्षा का ध्येय नहीं

  "शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य अधिक बल एवं ज्ञान अर्जन करने तक सीमित नहीं , बल्कि उस बल और ज्ञान के द्वारा समृद्ध , सभ्य और स्वस्थ   समाज का निर्माण है ।"                                                                                                                          - अल्बर्ट आइंस्टीन लौकिक शिक्षा का मुख्य ध्येय अधिकाधिक सम्पति का संचय करना नही वरन व्यक्ति के सम्पूर्ण विकास को प्रोत्साहित करना होता है , जो उसे न केवल अधिकाधिक ज्ञान और विज्ञान में समर्थ बनाता है , बल्कि सही तरीके से सोचने , समझने, संवाद करने , नैतिक मूल्यों को समझकर उनको विकसित करने , समस्याओं का समाधान करने , समाज में अपना योगदान देने , और ...

मैं बताऊँ आपको....

  सर नमस्ते......आप यही हैं या बाहर ? जी....जी.....नमस्ते...........अरे अरे अरे.....वो क्या उस दिन थोडा काम आ गया था तो मैं हाजिर नहीं हो पाया | आप हैं अभी ऑफिस में तो पांच मिनट में हाजिर होता हूँ....बस अभी घर पहुंचा ही था और आपका फ़ोन आ गया | बस ये आया...... ठीक है सर........ आधे घंटे बाद ऑफिस पहुंचकर...... अरे क्या बताऊँ आपको आज तो बहुत अच्छा हुआ जो मिसेज ने मुझे जिद करके सुबह 8 बजे ही दाल बाटी खिला दी | फिर मिसेज को छोड़ा मैंने कार्यालय और मैं गया .......... आपको बताऊँ पहले मैं सुबह .......(स्थान का नाम उद्देश्य पूर्वक नहीं बताया जा रहा हैं) गया वहां से मैं  10 बजे यहाँ गया और फिर अपने यहाँ आकर यहाँ सबसे बात की | अब क्या बताऊँ आपको एक मैं ही हूँ दौड़ने वाला | कोई नहीं आता हैं मैं आपको बताऊँ..........सारा काम मुझे ही करना पड़ता हैं ...........बस यहाँ से वहां दौड़ता रहता हूँ अकेला ही | अब यहाँ से कहाँ कहाँ जाऊँगा और घर कब पहुंचूंगा तथा मैं कितना काम करता हूँ की साडी जानकारी देने के बाद.....चलिए फिर करते हैं आपने जो कहाँ फिर बात कर लेंगे हम उसके लिए........| (बात बात में ही सभी पञ्...

“मैं तब भी जाग रही होती हूँ”

Late post from collection- जब सारा जहाँ सो रहा होता है, गगन में तारे भी सो जाते है और चाँद भी थककर चूर हो जाता है, भास्कर तब शायद भुवन की राह चलने को होता है,  मैं तब भी जाग रही होती हूँ............... जाने कौनसी राग में मैं तब गा रही होती हूँ ना सुनता है मेरे गीत कोई न समझती हूँ खुद मैं ही बेसुरा, बेतरतीब सा.... अनजाना या फिर जाना पहचाना सा राग नहीं पहचानती, स्वर भी उसके ठीक से नहीं जानती, मगर ,  हाँ जब सारा जहाँ सो रहा होता है.... तब मैं जाग रही होती हूँ.................|| वही पुराना गीत गुनगुनाती हूँ...... कुछ बात करती हूँ चुपचाप और बहुत कुछ समझ रही होती हूँ बात में वही शब्द होते है, कुछ गिने चुने हर दिन उन्हीं से कुछ नया जोड़ रही होती हूँ फिर उसी नए जोड़ से बात नई कहती हूँ लेकिन समझ कर उसको और गहरे उतरती जाती हूँ वही पुरानी बात वही पुरानी सौगात उस बात में एक ‘शिव ’   और एक मैं,  जिसका कोई नाम ,  पता और परिचय नहीं  बस हम होते है और होता भी कोई नहीं, जी भर के बात करती हूँ तुमसे साथ रहती हूँ तुम्हारे ना मैं कुछ कहती हूँ ना तुम  मौन के इतने शोर में जाने ...

पहले सब अच्छा था.........

 Late post from 2020... पहले सब अच्छा था......... किसी से मिलना झुलना तो अब जैसे ख्वाब हुआ, परिस्थितियों को देखते तो गुनाह हुआ |  तो क्या करेगा आदमी, हाँ,  वो ही मेरी तरह फ़ोन करेगा किसी से बात करने को |  मैंने भी किसी समझदार को कल मिलाया था फ़ोन |  समझदार इसलिए कि वो उम्र में मुझसे बहुत अधिक बड़े है | समान्य सी बातचीत के बाद वही ब्रहम वाक्य जो अक्सर सुनते रहते है प्रत्येक दुसरे व्यक्ति से कि पहले सब बहुत अच्छा था | मैंने विषय को आगे ना बढ़ाते हुए हामी भरी और शिष्टाचारी फ़ोन को विराम दिया | पर फिर देर रात तक मैं सोचती रही कि कौनसा समय अच्छा था और कौनसा अच्छा नहीं था? तब याद आया कभी  पिताजी का ये बताना कि दादजी का बहुत अच्छा व्यवसाय था, उनका बहुत नाम था ,  गाँव के लोग उन्हें बहुत  मानते  थे लेकिन उनके असमय देहांत के बाद कोई संभालने वाला नहीं था और जो अपने लोग थे वो ही सब खा गए | दादी कहती थी की दादाजी के समय में सबकुछ बहुत अच्छा था, भुआ और पिताजी की जेब काजू-बादाम से   भरी  होती थी और दादी बहुत सारा सोना पहनती थी लेकिन उनके...

आध्यात्मिक सामंजस्य की आवश्यकता

  राहुल एक बड़ी कंपनी में नौकरी करता था और उसके जीवन में दिनभर की भागदौड़ थी। उसके अत्यधिक काम, लोगो से मिलने , अनेकानेक निर्णय लेने , और समय के अभाव के चलते वह हमेशा तनावग्रस्त दिखता था। वह अपने तनाव को कम करने के लिए अलग-अलग मनोरंजन और शारीरिक व्यायाम की कोशिश तो करता था लेकिन उसे कोई फायदा नज़र नहीं आ रहा था। इधर  आध्यात्मिकता का राहुल के जीवन से दूर दूर तक कोई संबंध नहीं था। एक दिन , राहुल अपने दोस्त ' विक्रम ' के घर जा रहा था , जो एक बड़े पुराने मंदिर के पास रहता था। मंदिर खुले मैदान में स्थित था |राहुल मंदिर के बाहर बैठ गया | थोड़ी देर बैठने के बाद उसने देखा कि कुछ छोटे बच्चे दौड़ते हुए मंदिर के सामने से निकल रहें हैं | मलिन और फटे वस्त्र में वे बच्चे राहुल को किसी गरीब परिवार के मालुम हुए | बच्चों के कोलाहल और अपने कौतुहलवश राहुल उन्हें देखने उनके पीछे गया | पास ही में उसने एक कच्ची बस्ती देखी जहाँ और भी बच्चे खेल रहे थे तो कुछ रोटी मांगते हुए रो रहे थे | राहुल को समझ आया कि वे भूख से रो रहे हैं और हो सकता है कि इनके पास बच्चो को खिलने के लिए कुछ ना हो |  जाने किस...

Investing Time For A Lifetime of Love & Care

Parenting is a profound journey filled with joys, challenges, and responsibilities. As parents, we hold the key to shaping our children's lives and molding  their futures. Among the many valuable gifts we can give them, the most precious and enduring is the gift of our time. In a fast-paced and demanding world, it is crucial to prioritize spending quality time with our children during their formative years. This investment not only strengthens the parent-child bond but also lays the foundation for a lifetime of love, caring, and emotional connection. The Power of Presence In the hustle and bustle of modern life style, parents often find themselves pulled in multiple directions – managing careers, household responsibilities, and social obligations. Amidst this chaos, it is easy to unintentionally neglect the time we spend with our children. However, research consistently shows that the quality of time spent with our children matters more than the quantity. Engaging in activiti...

जो हो सकता है वो हो रहा है......

  जो हो सकता है वो हो रहा है... जीवन बस इतनी सी बात समझने का नाम है  कभी कभी मनुष्य जीता है  किसी ऐसी एक आस में  उम्मीद में  फ़रियाद में  जिसे सुनने में ईश्वर की भी कोई रजा नहीं | प्रयास करता है  सतत चलता है  कहीं भी किन्तु पहुंचता नहीं    कदाचित इसलिए कि  उसमे छुपा नहीं होता हित समाज का  निर्माण राष्ट्र का  सेवा मानवता की | अपने लिए चाहता हैं  और अपने स्वार्थ को चाहना कोई बड़ा काम नहीं |  किन्तु उसकी इक आस, जो होती है उसी के लिए केवल ख़ास  वो किसी और के लिए कुछ नहीं   मगर आवश्यक होती है स्वयं के लिए  कुछ ऐसे, जैसे  जीना चाहे तो श्वास की तरह  मरना चाहे तो मौत की तरह  प्यासे को पानी की तरह  भूखे को रोटी की तरह | लेकिन  जिसे तुम जरुरी समझो  जरुरी नहीं कि वो सभी को जरुरी हो ही  और शायद यहीं से शुरू होता है  एक दौर समझने समझाने का  अपेक्षाओं के अम्बार को ढहाने का  निराशा के भार से मुक्त होने का  कुछ मरने का, कुछ को मार देने का  अंतत: समझते ह...