मंदिर का भगवान्-
मंदिर का भगवान्- एक या दो मूर्ति बिठाकर कर देते है प्राण प्रतिष्ठा फिर सुबह शाम उनकी करते हैं सभी पूजा धूप - दीप , आरती भजन और बजा के शंख-घंटा होते है मगन और भी ना जाने कैसे कैसे यतन अनगिनत और अद्वितीय जतन.....! भावना के भूखे होते हैं भगवान् ऐसा कहकर भक्त रखते हैं मुट्ठी भर प्रसाद दिन में दो बार फिर बंद करते है द्वार और खोलकर करते हैं दर्शन..... रात को जड़ते हैं बड़ा सा ताला ताकि चौरी का हर संकट जा सके टाला चोर भी वैसे ले जाता नहीं भगवान् को साथ उसके भी तो बस गहनों पर ही जाते हैं हाथ क्या भगवान् सच में किसी का अपना नहीं ? या फिर उसका ही कोई भी सपना नहीं ? आस्था कहो , श्रद्धा कहो या कह दो लोगो का टाइम पास वो तो आते-जाते हैं इसलिए ताकि दे सके तुम्हे अपने होने का एहसास बताओ, वरना आज तक कोई रुका है साथ तुम्हारे रात में जागा है लेकर पानी का लौटा कि शायद भगवान् प्यासे हैं हमारे कौन आया है तुम्हारे पास पूछने की बताओ क्या है मन में तुम्हारे फिर तुम्हे कोई शिकायत भी नहीं चहरे पर कोई शिकन भी नहीं किसी ने कुछ दिया तो दिया ना दिया तो ना सही क्या तेरी किसी से कोई उम्मीद नहीं या तुझम...