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Showing posts from April, 2020

क्योंकि थोडा सा कुछ 'नहीं' भी अच्छा होता है.......

"दुनिया तुम्हे सुनने में माहिर बनाएगी, पर तुम अनसुना करना खुद ही सीखना, क्योंकि....थोडा सा कुछ 'नहीं' भी अच्छा होता है....... वाक् पटु बनाएगा तुम्हे ये संसार, किन्तु तुम मौन रहना खुद सीख जाना, क्योंकि....थोडा सा कुछ 'नहीं' भी अच्छा होता है....... संसार का बल होगा सबकुछ देखने पे तुम अनदेखा करना भी सीखते हुए चलना क्योंकि....थोडा सा कुछ 'नहीं' भी अच्छा होता है....... जगत तुम्हे हर जगह महत्त्व दिखाएगा तुम सारहीन को भी समझते रहना क्योंकि....थोडा सा कुछ 'नहीं' भी अच्छा होता है....... संसार तुम्हे अपने रास्ते चलाएगा तुम मगर रास्ता अपना मत छोड़ना क्योंकि....थोडा सा कुछ 'नहीं' भी अच्छा होता है....... भुवन तुम्हे अपना कहेगा मगर तुम उसे सपना समझना क्योंकि....थोडा सा कुछ 'नहीं' भी अच्छा होता है....... ये दुनिया चाहेगी तुम्हे सबकुछ में सम्मिलित करना पर तुम थोड़े उदासीन भी रहना क्योंकि....थोडा सा कुछ 'नहीं' भी अच्छा होता है....... संसार तुम्हे मंच के करतब दिखाएगा मगर तुम कोशिश करना परदे के पीछे देखने की क्योंक...

वो अनजान, अजनबी, जिसे किसी ने लिखा नहीं.....

क्या तुम जानते हो उसे? वही...... अरे ! वही....... जिसे अपनी गली-मोहल्ले से बाहर कोई जानता नहीं उस अनजान अजनबी को लिखना है आज, जिसे आज तक किसी ने लिखा नहीं उस अनछुए को छूना है आज जिसे आज तक किसी ने छुआ नहीं उस शख्स को, जिसे अपने ही मोहल्ले के बाहर कोई जानता नहीं........... उसने बाल कब कटवाए कब उसने सस्ती सी नई चप्पल खरीदी इसका कोई जिक्र नहीं दरजी के सिले कपड़ों को किसी ने नॉटिस किया नहीं जिसका किसी ब्रांड से कोई वास्ता नहीं वो कौनसी क्रीम लगाता है, और कौनसा इत्र उस महक का किसी को अंदाजा नहीं आज उसकी शोपिंग का शिड्यूल लिखना है ........... उसकी आँखें खुबसूरत है या उसकी कदकाठी अच्छी वो दिखता अच्छा है या फिर उसकी आवाज़ अच्छी ऐसा भी कभी किसी ने बताया नहीं जिसे कभी किसी ने सुन्दर कहा ही नहीं आज उसकी सुन्दरता को लिखना है .......... उसके जन्मदिन पर ढेरों उपहार नहीं आए कोई सरप्राइज़ पार्टी नहीं हुई फूलों के गुलदस्ते नहीं आए जो नहीं गया क्लब में होटल में जिसने कभी खाना भी खाया नहीं आज उसका B'day Celebration लिखना है............... जिसने पाउट बनाकर सेल्फी ली नही...

प्रेम मुक्त करता है.....

शब्द संसार नहीं सुहाता मुझे मेरा मौन अब अच्छा लगता है, लोगो की भीड़ भली नहीं लगती मुझे मेरा एकांत अब प्रिय लगता है, ज्ञान के मकडजाल में दम घुटता है मेरा आँख का अनवरत अश्रु बहाना सुखद लगता है, तुमसे भी बतियाने का मन नही करता अब बस तुम्हे अहसास में जीना प्रिय लगता है, तेरे इस संसार में सार नहीं दिखता श्वास में समाया तेरा विस्तार सुकूं देता है, कायनात भी मिले मुझे तो चाहत नहीं उसकी एक तेरा भीतर गहराना उपलब्द्धि देता है, ग्रंथों ने बहुत ग्रंथियां बाँधी है अब तक मगर हे शिव ! तेरा ये 'प्रेम' मुझे अब मुक्त करता है !