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Showing posts from October, 2019

अनुभव या नवाचार

रवि और आदर्श जब तक अपने-अपने समय (ज़माने) को एक दूसरे के समय (ज़माने) से बेहतर बताते रहते तब तक तो सब कुछ ठीक चलता किंतु जैसे ही दूसरे के समय को अपने समय से हल्का बताने लगते तो झगडा शुरु हो जाता । दोनों का समय (ज़माना) इसलिये अलग अलग था क्योंकि रवि और आदर्श क्रमशः पिता और पुत्र थे । अध्यात्म की भाषा में जिसे आसक्ति कहते हैं वह यहाँ भी थी । आसक्ति मतलब लिप्त हो जाना , फिर चाहे वह वस्तुओं के लिए हो , व्यक्तियों के लिए हो या अपने समय के लिए । श्रद्धेय डॉ प्रणव पंड्या कहते हैं - "आसक्ति केवल आ सकती है , जा नहीं सकती" । कदाचित इसीलिये ये झगडा करा देती है । यहाँ दोनों पिता और पुत्र आसक्त थे अपने अपने समय के लिए , उस समय के साथ जुडी अन्य बातों के लिए । जहाँ रवि के पास अपने समय की पूँजी के रूप में अनुभव है , वहीं आदर्श की पूँजी उसके नवाचार और तर्क है । रवि के दृष्टिकोण में अनुभव के सामने सब बेकार है जबकि आदर्श के लिए अनुभव उस अवलंबन के समान है जो व्यक्ति को स्वावलंबी नहीं बनने देता । आदर्श के लिए नवाचार ही उसकी सम्पत्ति है और रवि के लिए नवाचार में समय लगाना समय की व्यर्थ बर्ब...

असंतुलन ही समस्या है

बचपन में चाय के साथ बिस्किट खाने से ज्यादा उसके खाने का तरीका याद आता है । चाय में अधिक समय तक डूबे रहने से घुलने की समस्या और कम समय तक डूबे रहने से मजा न आने की समस्या के बीच में वे लोग होते हैं जो इस कार्य में महारथ हासिल किये होते हैं। इसी महारथ का नाम है संतुलन । यही वह सम्यावस्था है जो पैंडुलम की मध्यावस्था कही जा सकती है । अस्थिरता तब तक है जब तक पैंडुलम किसी एक और है । जैसे ही मध्य में पहुंचा , स्थिरता आ जाती है । यही स्थिरता है – संतुलन । जन्म से लेकर मृत्यु तक हर व्यक्ति का जीवन एक पैंडुलम की भाँति चलता रहता है । इसमें से 80% वे हैं जो पैंडुलम की मध्यावस्था से "कुछ" दूरी बनाये रहते हैं , प्रत्येक व्यक्ति का "कुछ" अलग अलग हो सकता है । केवल 20% हैं जो संतुलन की अवस्था में रहते हैं । ये संतुलन की अवस्था में रहने वाले 20% ही व्यक्ति हैं ,   जिनको इस विश्व की संपूर्ण खुशी के लिए धन्यवाद दिया जा सकता है । शेष 80% में से तो हर कोई आपाधापी में दिखाई पडता है , प्रत्येक व्यक्ति दौड रहा है । एक ऐसी दौड जो छद्म है , जिसमें मरीचिका की भाँति दिखाई देने वा...