जो संतुलित है, वही योगी है
जो संतुलित है, वही योगी है सितम्बर माह की शुरुआत ही थी और पूरा कोटा शहर बारिश में पूरी तरह भीगा हुआ था , भीगा क्या था , वास्तव में तो निचोड़ने की स्थिति बनी हुई थी । जिधर देखो उधर पानी ही पानी । मुझे शाम के लगभग 7 बजे ट्रेन पकड़नी थी । चिन्ता यह नहीं थी कि मुझे ट्रेन मिलेगी या नहीं बल्कि यह थी कि ट्रेन चलेगी भी या नहीं । उस पर आश्चर्य की बात यह थी कि जो लोग कुछ दिन पहले तक बारिश के आने के लिए पूजा/ प्रार्थना कर रहे थे अब वे ही लोग बारिश के रूकने के लिए प्रार्थनारत दिखाई पड़ रहे थे। या तो पहले वाली प्रार्थना कुछ ज्यादा हुई होगी या फिर बाद वाली प्रार्थना कुछ कम रह गयी होगी , जो भी हो पर परेशानी हर चेहरे पर दिखाई दे रही थी। वास्तविकता यह है कि न तो कम से खुशी न ही ज्यादा से , खुशी तो ज्यादा और कम के बीच में है । इस ज्यादा और कम के बीच का नाम ही है – संतुलन । मेरी ट्रेन समय पर चलने की सूचना मिली , स्टेशन पहुँचने में भी कोई दिक्कत नहीं हुई । ट्रेन जब तक रुकी रही तब तक तो बारिश ही चर्चा का विषय बनी हुई थी , शायद ये उन लोगों के लिए जो ट्रेन पर किसी को छोडने आये होंगे और उन्हे घर पर वापस...