।। एक प्रार्थना।। काश.... छोड़कर उङ जाऊ पिंजरे को जैसे मन उङ जाता छोड़ के तन को दूर गगन के पार जहाँ बस हो एक ही द्वार। काश..... छोड़कर बन्धन भी इस तन का सिमरू प्रभु मेरे मन मन्दिर का दूर जगत के पार जहाँ बस हो एक ही द्वार। काश.... छोड़के बन्धन जीवात्मा का तन, मन और जीवन का दूर देह के पार जहाँ बस हो एक ही द्वार। काश..... रहूँ नित तेरे मन मन्दिर में बसु बस तेरे ही जीवन में और कोई ना ठौर जहां बस तू ही चारों ओर। काश......
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कहां है निर्मल, निर्दोष निश्छलता? एक बालक सहज, सरल, मासूम और सच्चा, पता है क्यों होता है वो इतना अच्छा? शायद इसलिए कि वो छल कपट नहीं जानता, वो सच और झूठ को नहीं जानता, वो अपना और पराया नहीं जानता, और शायद इसलिए भी कि वो साफ, स्वच्छ, पवित्र और निर्दोष होता है, खरा होता है। निर्मल मन और निश्छल भावों का स्वामी होता है। मगर कैसे होता वो इतना मौलिक, सारे गुणों से परिपूर्ण? क्योंकि वो संसार के विष से वाकिफ नहीं होता अर्थात उसकी सोच काम, क्रोध, मद, लोभ और मोह से प्रभावित नहीं हुई है। तो फिर कहां खो जाती हैं उसकी ये सारी विशेषताऐ, उसके ये सारे दैवीय गुण? क्या इसलिए कि वो बङा हो जाता है? या फिर इसलिए कि वो अपने को बदल लेता है? कहीं ऎसा तो नहीं कि उसके अपने, उसके अजीज जो खुद को बनाए नहीं रख पाए, जो इस संसार के विष में डूबे हैं वो उसकी पवित्रता को सह नहीं पाते? या फिर इसलिए कि बालक के पालनहार इतने गर्त में समा चुके कि उनका एकमात्र उद्देश्य अपने बालकों को भी अपने जैसा बनाना ही रह गया है? क्या और कैसे समझाया जाता है लड़कियों को ऎसा कि वो अपने पिता में एक पुरूष, भाई में एक लड़का और हर पुरुष में...