जो हो सकता है वो हो रहा है......
जो हो सकता है वो हो रहा है...
जीवन बस इतनी सी बात समझने का नाम है
कभी कभी मनुष्य जीता है
किसी ऐसी एक आस में
उम्मीद में
फ़रियाद में
जिसे सुनने में ईश्वर की भी कोई रजा नहीं |
प्रयास करता है
सतत चलता है
कहीं भी किन्तु पहुंचता नहीं
कदाचित इसलिए कि
उसमे छुपा नहीं होता हित समाज का
निर्माण राष्ट्र का
सेवा मानवता की |
अपने लिए चाहता हैं
और अपने स्वार्थ को चाहना कोई बड़ा काम नहीं |
किन्तु उसकी इक आस,
जो होती है उसी के लिए केवल ख़ास
वो किसी और के लिए कुछ नहीं
मगर
आवश्यक होती है स्वयं के लिए
कुछ ऐसे, जैसे
जीना चाहे तो श्वास की तरह
मरना चाहे तो मौत की तरह
प्यासे को पानी की तरह
भूखे को रोटी की तरह |
लेकिन
जिसे तुम जरुरी समझो
जरुरी नहीं कि वो सभी को जरुरी हो ही
और शायद यहीं से शुरू होता है
एक दौर
समझने समझाने का
अपेक्षाओं के अम्बार को ढहाने का
निराशा के भार से मुक्त होने का
कुछ मरने का, कुछ को मार देने का
अंतत: समझते हो तुम
इशारा एक नसीब का
और विराम देते हो तुम अपनी कोशिशों को
चाहतों और ख्वाहिशों को
सतत चलते एहसास को
और अपने भीतर की उस आस को |
चुनते हो फिर एक राह
जहाँ फर्क नहीं पड़ता
क्या होगा क्या नहीं
कौन होगा कौन नहीं
कैसा होगा कैसा नहीं
बस ये ज्ञात रहेगा
जो हो सकता है वो हो रहा है...
जो नहीं हो रहा वो नहीं हो सकता होगा...
शायद तुम, स्वीकारोक्ति में आगे बढ़ गए हो.....||
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