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Showing posts from 2019

दूसरों के दुख में दुखी और खुशी में खुश!

प्रत्येक व्यक्ति अपने को श्रेष्ठ बनाने हेतु सतत प्रयत्न करता रहता है । इस श्रेष्ठता के मानक कुछ गुण हैं , जिनमें से एक का नाम है संवेदना । संवेदनहीन मनुष्य उस पत्थर की भांति माना गया है जो न तो किसी हवा के झोंके से हिलता है और न ही बारिश का पानी उस पर कोई प्रभाव डालता है । संवेदना वह पहला गुण है जो मनुष्य के सजीव होने का परिचायक है ।   पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी कहते हैं - कोई मनुष्य कितना संवेदनशील है इस बात का अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि वह दूसरों के दुख को अपने दुख जैसा समझकर व्यथित होता एवं उस दुख को बाँटने का प्रयत्न करता है अथवा नहीं । साथ ही साथ दूसरों की खुशियों को अपनी खुशी मानकर उनके साथ उत्साहित एवं उल्लसित होता है अथवा नहीं । डॉ प्रणव पंड्या का कथन है - कोई भी कर्म यदि केवल ऊपरी मन से किया गया है तो उसके होने और न होने में प्रतीकात्मक अन्तर हो सकता है , प्रभावित करने वाला नहीं । निस्सन्देह दूसरों के दुख में दुखी होना एवं खुशियों में खुश होना यदि प्रदर्शन मात्र है तो न तो उसका परिणाम उनके लिए श्रेयस्कर होगा और न ही इसे कर्ता की संवेदनशीलता माना जा सकत...

कागज पे कुछ लिखना चाहती हूँ

क्या लिखूं, कैसे लिखूं, कुछ समझ नहीं पाती हूँ, पढ़े और लिखे सारे शब्दों में घूम आती हूँ, मगर किसी भी शब्द को ठीक नहीं पाती हूँ, शब्द संज्ञाएँ जैसे बेमानी हो गई हैं, कबीर के ढाई आखर की कहानी भी अब कहानी हो गई है, जैसे शब्द ही कोई नया गढ़ना चाहती हूँ, मैं आज भी कागज पे कुछ लिखना चाहती हूँ.......

कठिनाईयों के रास्ते से ही सच हो सकते हैं सपने

पुरानी कहावत है - "कुछ पाने के लिए कुछ खोना ही पडता है"। कहावतों के पीछे अपनी कहानियाँ हैं , स्वाभाविक है कि इस कहावत के पीछे भी होगी ही। जो भी हो किंतु इस कहावत का एक भाग है "पाना" और दूसरा भाग है "खोना"। जितना मीठा चाहिये उतनी शक्कर डालनी पडेगी , वैसे ही जितना अधिक पाना है उतना ही अधिक खोने की तैयारी भी करनी पडेगी। एक निवेशक कुछ पैसे लेकर निवेश करने के लिए ब्रोकर के पास गया। निवेशक चाहता था कि उसे अधिक से अधिक मुनाफ़ा हो , यही इच्छा उसने जाहिर भी कर दी। ब्रोकर ने कहा - अधिक मुनाफ़े की चाहत है तो रिस्क भी अधिक उठानी पडेगी। निवेशक अधिक रिस्क की घबराहट में बिना निवेश किये अपने पैसे लेकर वापस घर आ गया। आज के समय में प्रत्येक व्यक्ति के भीतर इसी प्रकार का एक निवेशक है जो अधिक मुनाफ़े की चाहत रखता है किंतु उसमें किसी प्रकार के खोने की रिस्क उठाने की बात से घबराहट होने लगती है। ऐसा नहीं है कि इस रिस्क का अर्थ केवल खोना ही है , यह रिस्क तो खोने के लिये स्वयं को तैयार करने की है। क्रिकेट खेलने का इच्छुक एक खिलाडी को एक बडे क्रिकेटर के साथ एक दिन बिताने क...

मन गई दीपावली ?

5 दिन का त्योहार , कब आया , कब गया पता ही नहीं चला। जो भी हो , दीपावली का त्योहार बड़ा ही मज़ेदार होता है। ढेर सारी छुट्टियाँ , ढेर सारे पटाखे , कितने ही तरह के पकवान , बडों से मिलने वाले ईनाम , नए नए कपडे , सभी का एक दूसरे के घर आना जाना और भी न जाने क्या क्या। बच्चों से लेकर बडों तक , सभी के लिये यह पर्व खुशियों का एक बड़ा भंडार खोल देता है। बाज़ार की रौनक तो देखते ही बनती है। जो लोग घर बैठे ही सभी सामान मंगवाने की चेष्टा रखते हैं , वे भी इस त्योहार पर किसी न किसी बहाने चले ही जाते है बाज़ार और कुछ न कुछ खरीद ही लेते हैं बाज़ार से। बच्चों की दीवाली पटाखों से , गृहिणियों की घर में बनने वाले पकवानों और घर की साज सज्जा से , वयस्क पुरुषों की कुछ नया खरीदने से और बडे बुजुर्गों की दीवाली घर परिवार के सभी लोगों से मिलजुल कर मनती है। इसलिए ही सभी के चेहरे खुशी से चमक रहे थे , शायद सभी ने अपनी अपनी मनमर्जी की दीपावली मना ली थी। किन्तु हमारे पड़ौसी मिश्रा जी घर के बाहर खडे होकर आने जाने वाले हर व्यक्ति से पूछते - मन गई दीपावली ? सभी का जवाब "हाँ" ही होता था क्योंकि अब तो दीपावली क...

परिवर्तन का पर्व - दीपावली

पर्वों का प्रतीक है भारतीय संस्कृति । कुछ पर्व छोटे मेलों की भाँति है तो कुछ महापर्व कुंभ के मेले की भाँति । दीपावली ऐसे ही महाकुंभ की भाँति सांस्कृतिक मूल्यों   को प्रति वर्ष अपने करीब लाने का प्रतीक पर्व है । पुराने को ठीक करने और एकदम बिगड़ चुके को बदल देने का पर्व है दीपावली । एक ऐसा पुण्य पर्व जिसके स्वागत हेतु न जाने कितने ही दिन पूर्व से तैयारी प्रारंभ कर दी जाती है । प्रतीक रूप में भले ही इसके साथ व्यापार करने वाले व्यक्तियों का लेखा जोखा ठीक करना जुडा हो किंतु वास्तव में इस पर्व की जितनी सार्थकता एक व्यापारी के लिए है उतनी ही , अपितु उससे भी कहीं अधिक , एक सामान्य व्यक्ति के लिए भी है । व्यापारी की दीपावली बाहरी महत्व की है जबकि शेष सभी के लिए इसका महत्व बाहरी होने के साथ साथ आंतरिक भी है । यह आंतरिक दीपावली का महापर्व चित्त के भीतर के बिगड चुके कुसंस्कारों को बदलने का अवसर है , और जो संस्कार कम होते दिखाई देते हैं उन्हें ठीक करने का अवसर है । मन ने जिन रिश्तों को पुराना मान लिया है उन्हे संवारने का अवसर है , जो रिश्ते पूरी तरह बिगड़ते दिखाई दे रहे हैं उनके प्रति ...

अनुभव या नवाचार

रवि और आदर्श जब तक अपने-अपने समय (ज़माने) को एक दूसरे के समय (ज़माने) से बेहतर बताते रहते तब तक तो सब कुछ ठीक चलता किंतु जैसे ही दूसरे के समय को अपने समय से हल्का बताने लगते तो झगडा शुरु हो जाता । दोनों का समय (ज़माना) इसलिये अलग अलग था क्योंकि रवि और आदर्श क्रमशः पिता और पुत्र थे । अध्यात्म की भाषा में जिसे आसक्ति कहते हैं वह यहाँ भी थी । आसक्ति मतलब लिप्त हो जाना , फिर चाहे वह वस्तुओं के लिए हो , व्यक्तियों के लिए हो या अपने समय के लिए । श्रद्धेय डॉ प्रणव पंड्या कहते हैं - "आसक्ति केवल आ सकती है , जा नहीं सकती" । कदाचित इसीलिये ये झगडा करा देती है । यहाँ दोनों पिता और पुत्र आसक्त थे अपने अपने समय के लिए , उस समय के साथ जुडी अन्य बातों के लिए । जहाँ रवि के पास अपने समय की पूँजी के रूप में अनुभव है , वहीं आदर्श की पूँजी उसके नवाचार और तर्क है । रवि के दृष्टिकोण में अनुभव के सामने सब बेकार है जबकि आदर्श के लिए अनुभव उस अवलंबन के समान है जो व्यक्ति को स्वावलंबी नहीं बनने देता । आदर्श के लिए नवाचार ही उसकी सम्पत्ति है और रवि के लिए नवाचार में समय लगाना समय की व्यर्थ बर्ब...

असंतुलन ही समस्या है

बचपन में चाय के साथ बिस्किट खाने से ज्यादा उसके खाने का तरीका याद आता है । चाय में अधिक समय तक डूबे रहने से घुलने की समस्या और कम समय तक डूबे रहने से मजा न आने की समस्या के बीच में वे लोग होते हैं जो इस कार्य में महारथ हासिल किये होते हैं। इसी महारथ का नाम है संतुलन । यही वह सम्यावस्था है जो पैंडुलम की मध्यावस्था कही जा सकती है । अस्थिरता तब तक है जब तक पैंडुलम किसी एक और है । जैसे ही मध्य में पहुंचा , स्थिरता आ जाती है । यही स्थिरता है – संतुलन । जन्म से लेकर मृत्यु तक हर व्यक्ति का जीवन एक पैंडुलम की भाँति चलता रहता है । इसमें से 80% वे हैं जो पैंडुलम की मध्यावस्था से "कुछ" दूरी बनाये रहते हैं , प्रत्येक व्यक्ति का "कुछ" अलग अलग हो सकता है । केवल 20% हैं जो संतुलन की अवस्था में रहते हैं । ये संतुलन की अवस्था में रहने वाले 20% ही व्यक्ति हैं ,   जिनको इस विश्व की संपूर्ण खुशी के लिए धन्यवाद दिया जा सकता है । शेष 80% में से तो हर कोई आपाधापी में दिखाई पडता है , प्रत्येक व्यक्ति दौड रहा है । एक ऐसी दौड जो छद्म है , जिसमें मरीचिका की भाँति दिखाई देने वा...

जो संतुलित है, वही योगी है

जो संतुलित है, वही योगी है सितम्बर माह की शुरुआत ही थी और पूरा कोटा शहर बारिश में पूरी तरह भीगा हुआ था , भीगा क्या था , वास्तव में तो निचोड़ने की स्थिति बनी हुई थी । जिधर देखो उधर पानी ही पानी । मुझे शाम के लगभग 7 बजे ट्रेन पकड़नी थी । चिन्ता यह नहीं थी कि मुझे ट्रेन मिलेगी या नहीं बल्कि यह थी कि ट्रेन चलेगी भी या नहीं । उस पर आश्चर्य की बात यह थी कि जो लोग कुछ दिन पहले तक बारिश के आने के लिए पूजा/ प्रार्थना कर रहे थे अब वे ही लोग बारिश के रूकने के लिए प्रार्थनारत दिखाई पड़ रहे थे। या तो पहले वाली प्रार्थना कुछ ज्यादा हुई होगी या फिर बाद वाली प्रार्थना कुछ कम रह गयी होगी , जो भी हो पर परेशानी हर चेहरे पर दिखाई दे रही थी। वास्तविकता यह है कि न तो कम से खुशी न ही ज्यादा से , खुशी तो ज्यादा और कम के बीच में है । इस ज्यादा और कम के बीच का नाम ही है – संतुलन । मेरी ट्रेन समय पर चलने की सूचना मिली , स्टेशन पहुँचने में भी कोई दिक्कत नहीं हुई । ट्रेन जब तक रुकी रही तब तक तो बारिश ही चर्चा का विषय बनी हुई थी , शायद ये उन लोगों के लिए जो ट्रेन पर किसी को छोडने आये होंगे और उन्हे घर पर वापस...

पहचान

पहचान अ पनी पहचान , अपनी Identity हो , बस यही तो था उसका लक्ष्य । कैसे बनेगी पहचान , यह तो वो शायद जानता भी नहीं था किंतु हमेशा एक ही बात सोचता था - "कुछ तो ऐसा करना है कि अपनी पहचान बना सकूँ।" अच्छे काम करने का जज्बा ऐसा था कि कई अच्छे लोगों (महापुरुषों) की जीवनी पढ चुका था। कदाचित उसी अध्ययन का परिणाम था कि उसकी प्रेरणा , आगे बढने का हौंसला , कुछ नया करने का ज़ज्बा और लगन उसकी उम्र के साथ बढते ही रहे। हालांकि अच्छा काम करके जल्दी पहचान बनाना इतना आसान नहीं होता जितना वो सोचता था। प्रसिद्धि अगर कम समय में चाहिये तो वो कुप्रसिद्धि हो सकती है , सुप्रसिद्धि तो नहीं। ये एक अलग बात है कि उस कुप्रसिद्धि में भी प्रसिद्धि तो छिपी हुई होती ही है। इसीलिए उसके कई मित्र , जिन्होनें प्रबंधन के सूत्र पढकर आगे बढने के short cuts  अपना रखे थे , उसे अक्सर कहा करते - "कुछ अलग करने के नाम पर कुछ वैसा करो जिसे Media का attention मिले , परिणाम उसका जो भी हो , एक बार तो प्रसिद्धि मिल ही जाएगी। फिर धीरे-धीरे M edia से जुड़े लोगों से दोस्ती का फायदा मिलेगा , फिर जो करना हो वो करत...