मौन वार्तालाप
दिनभर मजदूरी करके लौट रही वो राधा आज अपने बच्चों के साथ एक फल वाले के पास रूकी और अंगूर का मोल पूछा। अंगूर भी वो थे जो आज नहीं बेचे गए तो कल कचरे में ही जाऐंगे लेकिन उस नौसिखिए छोटे से बच्चे ने भी किसी मंजे हुए व्यापारी की भांति कम गले अंगूरों का दाम अधिक बताकर अधिक गले अंगूरों को खरीदने की सलाह दी। सलाह दी या राधा की परिस्थिति पर तीखा व्यंग्य कसा पता नहीं। राधा ने गले अंगूर का 40 रूपये किलो भाव सुना और अपने हाथ में भींच रखे 10 रूपये के नोट को देखा और बिना कुछ कहे चेहरे के भाव से सबकुछ कह दिया। राधा के बच्चों को उस वार्तालाप से कोई लेना-देना नहीं था और तो और इस बात से भी शायद नहीं कि वहाँ रूकने का मतलब अंगूर मिल जाने की गारंटी नहीं थी। शायद वे मासूम आज अंगूर खाने के ख्वाब में गहरे डूबे थे। लेकिन इससे किसी को क्या फर्क पड़ता है कि राधा ने अंगूर खरीदे या नहीं? सलमा ने आज सब्जी बनाई या नहीं? काका ने आज खाना खाया या फिर भूखे ही सो गये। कोई आज दिनभर सोया ही या फिर रोया ही या कोई आज बाजार गया ही नहीं।क्योंकि उसकी जेब में एक भी पैसा नहीं था | फर्क किसी को पङा भी ...