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Showing posts from September, 2023

मौन वार्तालाप

  दिनभर मजदूरी करके लौट रही वो राधा आज अपने बच्चों के साथ एक फल वाले के पास रूकी और अंगूर का मोल पूछा। अंगूर भी वो थे जो आज नहीं बेचे गए तो कल कचरे में ही जाऐंगे लेकिन उस नौसिखिए छोटे से बच्चे ने भी किसी मंजे हुए व्यापारी की भांति कम गले अंगूरों का दाम अधिक बताकर अधिक गले अंगूरों को खरीदने की सलाह दी।  सलाह दी या राधा की परिस्थिति पर तीखा व्यंग्य कसा पता नहीं। राधा ने गले अंगूर का 40 रूपये किलो भाव सुना और अपने हाथ में भींच रखे 10 रूपये के नोट को देखा और बिना कुछ कहे चेहरे के भाव से सबकुछ कह दिया। राधा के बच्चों को उस वार्तालाप से कोई लेना-देना नहीं था और तो और इस बात से भी शायद नहीं कि वहाँ रूकने का मतलब अंगूर मिल जाने की गारंटी नहीं थी। शायद वे मासूम आज अंगूर खाने के ख्वाब में गहरे डूबे थे।  लेकिन इससे किसी को क्या फर्क पड़ता है कि राधा ने अंगूर खरीदे या नहीं? सलमा ने आज सब्जी बनाई या नहीं? काका ने आज खाना खाया या फिर भूखे ही सो गये। कोई आज दिनभर सोया ही या फिर रोया ही या कोई आज बाजार गया ही नहीं।क्योंकि उसकी जेब में एक भी पैसा नहीं था |   फर्क किसी को पङा भी ...

क्या है जीवन वास्तव में...??

  कभी लगता है सुख दुःख की यात्रा है जीवन , तो कभी बस चलते जाने का नाम है जीवन , कभी रास्ता है, तो कभी ठोकरों में पड़ा पत्थर है जीवन , कभी समझौतों का नाम है ,  कभी ख्वाहिशों का दाम हैं , कभी आँखों का पानी खारा तो कभी होंठों की मुस्कान है जीवन , कभी जिम्मेदारियों का एहसास तो कभी अधिकारों का बोझ है जीवन , कभी सबकुछ खो देने वाला पल है , कभी एक ही पल में सबकुछ पा लेने का खेल है जीवन , कभी किसी का साथ तो कभी किसी को बिसरा देना है जीवन , खोना ,  पाना ,  कुछ लेना तो कभी सबकुछ दे देना है जीवन , कभी कोई अपना ,  तो कभी संसार मात्र एक सपना कभी मौन तो कभी शब्दों के संसार की रचना है जीवन , कभी पहेली ,  कभी सहेली, कभी रूठना ,  कभी मान जाना, कभी शिकायतें तो कभी कोशिशों का नाम है जीवन , कभी मौन की भाषा ,  कभी आँखों की अभिलाषा, कभी संगीत है जीवन तो कभी लय-ताल का तमाशा, कभी हवा का झोंका, कभी दरिया का किनारा, कभी तरसती धरा तो कभी बरसता बादल है जीवन, कभी मिलन ,  कभी वियोग ,  तो कभी समस्त का सुयोग है जीवन , कभी हवन, कभी आहूति, कभी ध्यान, कभी समाधि, तो कभी श्वा...

प्रथम आना महत्वपूर्ण है या ईमानदार होना ?

  सुरभी मेम कक्षा छठी के बच्चों को हिन्दी पढ़ा रही थी। पाठ था ईमानदारी ।  विभिन्न उदाहरणों के माध्यम से सुरभी मेम ने बताया कि ईमानदारी का गुण क्यों मनुष्य जीवन में उच्च स्थान रखता है तथा कैसे उसे आत्मसात किया जा सकता है। उन्होंने अपनी तरफ से आज का पाठ समाप्त कर बच्चों से पूछा कि यदि उनके मन में कोई प्रश्न है तो वे पूछ लें। शुभांग जो कि बहुत ही गौर से सब-कुछ सुन रहा था उसने अपना हाथ उठाया और पूछा, "प्रथम आना महत्वपूर्ण है अथवा ईमानदार होना?" प्रथम आने वाले लोग ईमानदार भी होते हैं, मेम ने कहा। किन्तु पिताजी कहते हैं कि कमिश्नर साहब प्रथम आए थे परन्तु वे तो रिश्वत भी लेते हैं? सुरभी मेम ने दो मिनट के लिए मौन साध लिया और पिछले दिनों अखबार की खबरें उनके जेहन से एक एक कर गुज़रने लगी। इतने में ही घंटी बज गई और वो अपने विचारों से लौटकर कक्षा में आईं। तथापि अगली कक्षा विज्ञान विषय की थी लेकिन सुरभी मेम को ईमानदारी के इस पाठ को अधूरा छोड़कर जाना अनुचित लगा और उन्होंने सुमित सर से प्रार्थना की कि वे आज का अपना कालांश उन्हें दे दें । सुरभी मेम ने छात्रों से मुखातिब होते हुए कहा कि वे उन्...

गर्म रोटियां

 मां और पिताजी शाम का भोजन करने के बाद रोज की तरह अपने कमरे में जा चुके थे। विद्रुप टीवी देखते हुए अपने आफिस की कुछ फाइल्स देख रहा था और बेटा अक्षांश दादा दादी के कमरे में खेल रहा था। रोज की तरह सभी को खाना खिला कर वर्तिका अभी अपनी प्लेट लेकर खाना खाने बैठी ही थी कि... अक्षांश ने कमरे से ही आवाज लगाई मां....दादी की दवाई नहीं मिल रही कहां रखी है? वर्तिका ने अपने हाथ में लिए कौर को वापस प्लेट में रखा और दवाई देने चली गई। लौटकर जब बैठी तो डोरबेल बजी और वो भगोनी उठाकर दूध लेने चली गई। वर्तिका ने दूध गैस पर चढ़ाया और फिर तसल्ली से खाना खाने बैठ गई। तभी अक्षांश दौड़ता हुआ आया, मां मेरी रीडिंग बुक नहीं मिल रही है। वर्तिका ने कहा कि वो उसकी बुक रैक की सेंकैड राॅ में रखी है लेकिन अक्षांश ने ये कह कर मना कर दिया कि उसने देखा वहां, बुक नहीं थी । वर्तिका उठी और उसकी किताब ढुंढने जाने लगी। विद्रुप कदाचित आज कुछ जरुरी काम नहीं कर रहा था या फिर आज वो घर में होते हुए घर में भी था शायद इसीलिए ये सारा घटनाक्रम देख और समझ रहा था । विद्रुप उठकर आया और उसने वर्तिका से कहा कि वो खाना खा ले अक्षांश की कि...

नैतिक मूल्यों की आवश्यकता

  नैतिक मूल्यों के विकास की आवश्यकता और विकास एवं संरक्षण कैसे किया जाए इस विषय पर चर्चा की जानी थी |        मुझे एक कहानी याद आ गई जो मैंने एक पुस्तक "मैं विद्यालय बोल रहा हूँ" में पढ़ी थी |        कहानी कुछ ऐसी थी कि एक व्यक्ति को चोरी और हत्या के मामले में फांसी की सजा सुनाई गई |        जेलर ने उससे पूछा कि क्या उसकी कोई अंतिम इच्छा है ?        उस व्यक्ति ने कहा कि वो अपनी माँ   से मिलना चाहता है |        जब उसकी माँ उससे मिलने आई तो उसने पास आते ही अपनी माँ को एक जोरदार तमाचा मारा | जेलर ने उसे पकड़ कर दूर किया और कहा भला अपनी माँ को कौन मारता है ?       जब उससे पूछा गया कि उसने अपनी माँ को क्यों मारा तो उसने कहा कि बचपन में जब पहली बार उसने अपने दोस्त का पेन चुराया तो उस दोस्त को पता चल गया कि वो पेन मैंने चुराया था | वो दोस्त अपने पिता के साथ शाम को मेरे घर आया | मैं तो बहुत डर गया था कि आज मुझे बहुत सज़ा मिलेगी | लेकिन मेरी माँ ने उल्टा ...