5 दिन का त्योहार , कब आया , कब गया पता ही नहीं चला। जो भी हो , दीपावली का त्योहार बड़ा ही मज़ेदार होता है। ढेर सारी छुट्टियाँ , ढेर सारे पटाखे , कितने ही तरह के पकवान , बडों से मिलने वाले ईनाम , नए नए कपडे , सभी का एक दूसरे के घर आना जाना और भी न जाने क्या क्या। बच्चों से लेकर बडों तक , सभी के लिये यह पर्व खुशियों का एक बड़ा भंडार खोल देता है। बाज़ार की रौनक तो देखते ही बनती है। जो लोग घर बैठे ही सभी सामान मंगवाने की चेष्टा रखते हैं , वे भी इस त्योहार पर किसी न किसी बहाने चले ही जाते है बाज़ार और कुछ न कुछ खरीद ही लेते हैं बाज़ार से। बच्चों की दीवाली पटाखों से , गृहिणियों की घर में बनने वाले पकवानों और घर की साज सज्जा से , वयस्क पुरुषों की कुछ नया खरीदने से और बडे बुजुर्गों की दीवाली घर परिवार के सभी लोगों से मिलजुल कर मनती है। इसलिए ही सभी के चेहरे खुशी से चमक रहे थे , शायद सभी ने अपनी अपनी मनमर्जी की दीपावली मना ली थी। किन्तु हमारे पड़ौसी मिश्रा जी घर के बाहर खडे होकर आने जाने वाले हर व्यक्ति से पूछते - मन गई दीपावली ? सभी का जवाब "हाँ" ही होता था क्योंकि अब तो दीपावली क...