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Showing posts from November, 2019

कागज पे कुछ लिखना चाहती हूँ

क्या लिखूं, कैसे लिखूं, कुछ समझ नहीं पाती हूँ, पढ़े और लिखे सारे शब्दों में घूम आती हूँ, मगर किसी भी शब्द को ठीक नहीं पाती हूँ, शब्द संज्ञाएँ जैसे बेमानी हो गई हैं, कबीर के ढाई आखर की कहानी भी अब कहानी हो गई है, जैसे शब्द ही कोई नया गढ़ना चाहती हूँ, मैं आज भी कागज पे कुछ लिखना चाहती हूँ.......

कठिनाईयों के रास्ते से ही सच हो सकते हैं सपने

पुरानी कहावत है - "कुछ पाने के लिए कुछ खोना ही पडता है"। कहावतों के पीछे अपनी कहानियाँ हैं , स्वाभाविक है कि इस कहावत के पीछे भी होगी ही। जो भी हो किंतु इस कहावत का एक भाग है "पाना" और दूसरा भाग है "खोना"। जितना मीठा चाहिये उतनी शक्कर डालनी पडेगी , वैसे ही जितना अधिक पाना है उतना ही अधिक खोने की तैयारी भी करनी पडेगी। एक निवेशक कुछ पैसे लेकर निवेश करने के लिए ब्रोकर के पास गया। निवेशक चाहता था कि उसे अधिक से अधिक मुनाफ़ा हो , यही इच्छा उसने जाहिर भी कर दी। ब्रोकर ने कहा - अधिक मुनाफ़े की चाहत है तो रिस्क भी अधिक उठानी पडेगी। निवेशक अधिक रिस्क की घबराहट में बिना निवेश किये अपने पैसे लेकर वापस घर आ गया। आज के समय में प्रत्येक व्यक्ति के भीतर इसी प्रकार का एक निवेशक है जो अधिक मुनाफ़े की चाहत रखता है किंतु उसमें किसी प्रकार के खोने की रिस्क उठाने की बात से घबराहट होने लगती है। ऐसा नहीं है कि इस रिस्क का अर्थ केवल खोना ही है , यह रिस्क तो खोने के लिये स्वयं को तैयार करने की है। क्रिकेट खेलने का इच्छुक एक खिलाडी को एक बडे क्रिकेटर के साथ एक दिन बिताने क...

मन गई दीपावली ?

5 दिन का त्योहार , कब आया , कब गया पता ही नहीं चला। जो भी हो , दीपावली का त्योहार बड़ा ही मज़ेदार होता है। ढेर सारी छुट्टियाँ , ढेर सारे पटाखे , कितने ही तरह के पकवान , बडों से मिलने वाले ईनाम , नए नए कपडे , सभी का एक दूसरे के घर आना जाना और भी न जाने क्या क्या। बच्चों से लेकर बडों तक , सभी के लिये यह पर्व खुशियों का एक बड़ा भंडार खोल देता है। बाज़ार की रौनक तो देखते ही बनती है। जो लोग घर बैठे ही सभी सामान मंगवाने की चेष्टा रखते हैं , वे भी इस त्योहार पर किसी न किसी बहाने चले ही जाते है बाज़ार और कुछ न कुछ खरीद ही लेते हैं बाज़ार से। बच्चों की दीवाली पटाखों से , गृहिणियों की घर में बनने वाले पकवानों और घर की साज सज्जा से , वयस्क पुरुषों की कुछ नया खरीदने से और बडे बुजुर्गों की दीवाली घर परिवार के सभी लोगों से मिलजुल कर मनती है। इसलिए ही सभी के चेहरे खुशी से चमक रहे थे , शायद सभी ने अपनी अपनी मनमर्जी की दीपावली मना ली थी। किन्तु हमारे पड़ौसी मिश्रा जी घर के बाहर खडे होकर आने जाने वाले हर व्यक्ति से पूछते - मन गई दीपावली ? सभी का जवाब "हाँ" ही होता था क्योंकि अब तो दीपावली क...

परिवर्तन का पर्व - दीपावली

पर्वों का प्रतीक है भारतीय संस्कृति । कुछ पर्व छोटे मेलों की भाँति है तो कुछ महापर्व कुंभ के मेले की भाँति । दीपावली ऐसे ही महाकुंभ की भाँति सांस्कृतिक मूल्यों   को प्रति वर्ष अपने करीब लाने का प्रतीक पर्व है । पुराने को ठीक करने और एकदम बिगड़ चुके को बदल देने का पर्व है दीपावली । एक ऐसा पुण्य पर्व जिसके स्वागत हेतु न जाने कितने ही दिन पूर्व से तैयारी प्रारंभ कर दी जाती है । प्रतीक रूप में भले ही इसके साथ व्यापार करने वाले व्यक्तियों का लेखा जोखा ठीक करना जुडा हो किंतु वास्तव में इस पर्व की जितनी सार्थकता एक व्यापारी के लिए है उतनी ही , अपितु उससे भी कहीं अधिक , एक सामान्य व्यक्ति के लिए भी है । व्यापारी की दीपावली बाहरी महत्व की है जबकि शेष सभी के लिए इसका महत्व बाहरी होने के साथ साथ आंतरिक भी है । यह आंतरिक दीपावली का महापर्व चित्त के भीतर के बिगड चुके कुसंस्कारों को बदलने का अवसर है , और जो संस्कार कम होते दिखाई देते हैं उन्हें ठीक करने का अवसर है । मन ने जिन रिश्तों को पुराना मान लिया है उन्हे संवारने का अवसर है , जो रिश्ते पूरी तरह बिगड़ते दिखाई दे रहे हैं उनके प्रति ...