पहले सब अच्छा था.........
Late post from 2020...
पहले सब अच्छा था.........
किसी से मिलना झुलना तो अब जैसे ख्वाब हुआ, परिस्थितियों को देखते तो गुनाह हुआ |
तो क्या करेगा आदमी, हाँ, वो ही मेरी तरह फ़ोन करेगा किसी से बात करने को |
मैंने भी किसी समझदार को कल मिलाया था फ़ोन |
समझदार इसलिए कि वो उम्र में मुझसे बहुत अधिक बड़े है | समान्य सी बातचीत के बाद वही ब्रहम वाक्य
जो अक्सर सुनते रहते है प्रत्येक दुसरे व्यक्ति से कि पहले सब बहुत अच्छा था | मैंने विषय को आगे ना बढ़ाते हुए
हामी भरी और शिष्टाचारी फ़ोन को विराम दिया |
पर फिर देर रात तक मैं सोचती रही कि कौनसा समय अच्छा था और कौनसा अच्छा नहीं था? तब याद आया
कभी पिताजी का ये बताना कि दादजी का बहुत अच्छा व्यवसाय था, उनका बहुत नाम था, गाँव के लोग उन्हें बहुत
मानते थे लेकिन उनके असमय देहांत के बाद कोई संभालने वाला नहीं था और जो अपने लोग थे वो ही सब खा गए |
दादी कहती थी की दादाजी के समय में सबकुछ बहुत अच्छा था, भुआ और पिताजी की जेब काजू-बादाम से
भरी होती थी और दादी बहुत सारा सोना पहनती थी लेकिन उनके देहांत के बाद कुछ ना छोड़ा लोगो ने |
फिर इतना अच्छा भी क्या काम का कि जब मुश्किल पड़ी और किसी को साथ देना चाहिए था तब मुश्किल में
और मुश्किल खड़ी की |
किन्तु मुझे तो तब भी सब कुछ अच्छा ही लगता था जब उन्हें रंज था, मेरी तो मस्ती थी खेलने की, खाने की, दौड़ने की, कूदने की और सोने की, बस अच्छा नहीं था तो माँ का डांटना और अक्सर पीट देना | तब मेरी उम्र कम थी और शेष सभी तो अपने अपने संबोधन के अनुरूप बहुत ज्यादा बड़े भी थे और उतनी ही बड़ी उनकी बातें जो बाल बुद्धि से बाहर की थी | फिर ये बात नई नहीं रही कि पहले सब अच्छा था क्योंकि मुझसे बड़े भाई -बहन कहते थे कि उनके बचपन में सब अच्छा था, माता-पिता कहते कि उनका समय और दादी-नानी कहती उनका समय, कुल मिलाकर सभी एक ही स्वर में बोलते थे | गली के लोगों का स्वर भी कुछ वैसा ही होता था | बदला कुछ नही था बस घर के बाहर जाने पर वो लोग अच्छे होते थे जो अब नहीं रहे इस दुनिया में जैसे फ़लां के पिताजी बहुत नेक थे फलां नहीं, फलां की सासू बहुत भली थी और बहु को देखो | लोग खराब, समय खराब , जमाना भी खराब | कुछ तो था जो ठीक नहीं था उनके अनुसार पर कुछ तो था जो ठीक ही था मेरे अनुसार |
कुछ था जिसके बदल जाने का दर्द था, कुछ था जिसके ना रहने का गम था, कुछ था जिसके घटित होने का तरीका अच्छा नहीं था पर समय तब भी बदल रहा था लेकिन अपनी गति और अपने ताल में किसी के चाहने से नहीं | और आज जब सोचती हूँ उस सबको तो लगता है ना तो काजू बादाम से खाली हुई जेब का शिकवा था भुआ पिताजी को, न दादी की उम्र रही थी सोना पहनने की और यदि था भी तो उसे वो ही समझ सकते थे क्योंकि जेब खाली होने पर अभाव खल सकता है | जिसकी भरी ही नहीं हो तो उसके खाली होने का दर्द कैसे समझ आएगा | दुःख, अभाव, अधूरी आकांक्षा सब मिलकर समय को कोसने का हक भले दे दे पर वास्तव में समय इसलिए खराब नहीं कहा जा रहा था | तो क्या समय के खराब होने का अर्थ इंसान की नीयत के खराब होने से था ?
सुख-दुःख, हंसना-रोना, अच्छा-बुरा, आना-जाना और राजा-रंक, स्वामी-दास, मालिक-गुलाम, अतिवृष्टि-अनावृष्टि, देव-दानव आंधी-तूफ़ान, खोना-पाना सभी युगों से साथ चल रहे हैं और सदैव चलते रहेंगे | ना उन्हें पहले कभी कोई विलग कर पाया है ना अब भी कोई कर पाएगा |
त्रेता युग में भी लोगों ने समय को खराब कहा उसके बदलने की दुआएं की | क्यों? क्योंकि एक मंथरा खराब थी, एक कैकेई बुरी थी और रावण का कुल खराब था? था तो अच्छा सबकुछ इसके अलावा, भरत अच्छा, कौशल्या और सुमित्रा अच्छी, सारी की सारी जनता अच्छी, विभीषण अच्छा, मंदोदरी, त्रिजटा और ऐसे अनेकानेक लोग | पर प्रार्थना का असर हुआ और तब एक बार फिर समय बदला था, राम राज्य आया था सभी खुश थे किन्तु क्या अच्छा समय देवी सीता का नहीं आया था जो उसे फिर से वन में धकेल दिया ? तो क्या इससे समय खराब हो गया? समय ना खराब होता है ना अच्छा वो केवल समय होता है | खराब होता है मन का मैल, ख़राब हो जाती है नीयत, खराब होता है स्वार्थ और खराब होती है ओछी सोच | अच्छा था अपनी बात पर बने रहना, वचन निभाना, लोभ और लालच को अपने करीब ना आने देना, बुराई के खिलाफ संघर्ष करना, जीवन को सिद्धांतों के साथ जीना | लेकिन अफ़सोस कि ज़माने को ख़राब जिस पीढ़ी ने कहा उन्होंने ही उसे अच्छा बनाने के लिए संघर्ष उतना नहीं किया जितना करना चाहिए था शायद | सच्चाई और इमानदारी में गिरावट आई, मन के भावों में खोट आई, संवेदना में कमी आई, अपनत्व खो गया, मनुष्य ह्रदय से करुणा खो गई और हो गया भावों का अभाव और बढ़ गया पैसों का प्रभाव | तब लोग शब्दों के अर्थ नहीं मर्म को समझ लेते थे, मन के भावों का महत्त्व अधिक था समय तो बदला ही है अब वो सब नहीं रहा | समय के साथ तो चलना ही था पर वो लेकर जिसे हम खोना नहीं चाह रहे थे और वही छूटता जा रहा था और हम केवल चाह रहे थे तो इसमें समय क्या करेगा?
द्वापर युग में भी लोगों ने समय के बदलने की प्रार्थनाएँ की, मीरा को भी किसी ने अमृत का प्याला नहीं भेजा था और आज भी लोग यही कह रहे है कि समय खराब है तो फिर अच्छा कब था? लोग कब अच्छे थे ? हर वो लम्हा जो गुजर चुका वो अच्छा था, हर वो शख्स जो निकल गया जीवन से या जमीं से वो अच्छा था ? युवा हुए तो तुम्हे ही तुम्हारा बचपन अच्छा लगने लगा, बूढ़े हुए तो तुम्हे ही तुम्हारा यौवन भला लगने लगा | अपना अतीत अच्छा सोचकर आज को गाली देते रहोगे और आने वाले कल की उम्मीद में अपना आज खो दोगे | सुनाते रहो फिर कहानियाँ उस समय की जिसे तुम साथ ला नहीं पाए क्योंकि तुमने अपने प्रयास नहीं किये सिर्फ चाहा | झींकते रहो फिर उस समय को जो कभी नहीं आएगा क्योंकि अब भी प्रयास नहीं करेंगे मगर चाहेंगे जरूर |
आज इस समय भी कोई कह रहा है समय को बदलना है, कोई कह रहा है समय बदल रहा है, कोई कह रहा है
हम परिवर्तन लाएंगे | समय प्रतिपल बदल रहा है, युगों से, फिर क्या बदलने की बातें कर रहे हो, अच्छा बुरा
किस आधार पर गाए जा रहे हो ? एक संसार बाहर चलता है, एक भीतर मन के पलता है और समय केवल वहीं
बदलता है | राम भी वहीं होता है और रावन भी, मीरा भी वहीं होती है और कृष्ण भी |
समय कभी न अच्छा था ना होगा क्योंकि राम होगा तो रावण भी होगा, कृष्ण होगा तो कंस भी होगा | वो अच्छा
आज ही है अगर तुम भीतर अच्छे हो गए हो | पहले भी वैसा ही था जैसा आज है आगे भी ऐसा ही होगा जैसा आज
है क्योंकि ये समय है प्रतिपल बदलता है पर कभी नहीं बदलता |
किसी की आवाज आई, जीजा, हम छोटे थे तब कितना अच्छा था ना........
लो हो गया फिर आज का समय खराब, ज़माना खराब, पहले सब अच्छा था.....|
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धर्म-अधर्म सुख-दुःख अच्छा-बुरा ये सब समाज के मानदंड और निजी मानस के फेर हैं। जीव गुण-आवेश में जीता है जबकि चेत गुणातीत है।
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