“मैं तब भी जाग रही होती हूँ”
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जब सारा जहाँ सो रहा होता है,
गगन में तारे भी सो जाते है
और
चाँद भी थककर चूर हो जाता है,
भास्कर तब शायद भुवन की राह चलने को होता है,
मैं तब भी जाग रही होती हूँ...............
जाने कौनसी राग में
मैं तब गा रही होती हूँ
ना सुनता है मेरे गीत कोई
न समझती हूँ खुद मैं ही
बेसुरा, बेतरतीब सा....
अनजाना या फिर जाना पहचाना सा
राग नहीं पहचानती,
स्वर भी उसके ठीक से नहीं जानती,
मगर, हाँ
जब सारा जहाँ सो रहा होता है....
तब मैं जाग रही होती हूँ.................||
वही पुराना गीत गुनगुनाती हूँ......
कुछ बात करती हूँ चुपचाप
और बहुत कुछ समझ रही होती हूँ
बात में वही शब्द होते है, कुछ गिने चुने
हर दिन उन्हीं से कुछ नया जोड़ रही होती हूँ
फिर उसी नए जोड़ से बात नई कहती हूँ
लेकिन
समझ कर उसको और गहरे उतरती जाती हूँ
वही पुरानी बात
वही पुरानी सौगात
उस बात में एक ‘शिव’
और एक मैं,
जिसका कोई नाम, पता और परिचय नहीं
बस हम होते है और होता भी कोई नहीं,
जी भर के बात करती हूँ तुमसे
साथ रहती हूँ तुम्हारे
ना मैं कुछ कहती हूँ ना तुम
मौन के इतने शोर में
जाने कैसे, नयन मूंद, सो लेते हो तुम
मगर, हाँ
जब सारा जहाँ सो रहा होता है
तब मैं जाग रही होती हूँ.................||
वही पुरानी बातें दोहरा रही होती हूँ,
मन मेरा मौजी, कि जाने बावरा
कुछ लिखने को आतुर होता है
और मैं तोड़ मरोड़ के उन्हीं चन्द शब्दों को फिर नए आयाम देती हूँ
ना कोई तुक होता है
ना ही सुन्दर शब्द कोई
ना अर्थ कोई
ना व्यर्थ ही
मैं तब भी रोज़ ही कुछ तो रच ही देती हूँ
जानती हूँ
तुम्हे समय नहीं मुझे उन शब्दों के माध्यम से रोज पढने का
तभी तो कहती हूँ सब और कहती कुछ नहीं
मगर ना मैं थकती हूँ
ना रूकती हूँ
सच कहती हूँ रोज़ ही मगर, उसी पुराने से कुछ नया लिख देती हूँ.....||
ना विषय बदलता है
न जूमला कोई
ना मैं कवि कोई, ना चाटुकार हूँ
साहित्यकार नहीं
ना व्याकरण की ज्ञाता
ना ही तुमसा बोध मुझे
मगर, हाँ
जब सारा जहाँ सो रहा होता है
तब मैं जाग रही होती हूँ..........
वही पुरानी कवितायेँ बार-बार लिख रही होती हूँ.........||
कितना अच्छा है ये एकांत (एक का अंत)
और फिर बस केवल तुम
पता है, कैसा लगता है?
जैसे सारा जहाँ खो गया हो
या फिर
जैसे सचमुच ही सो गया हो........
पता नहीं मुझे, कैसे कहूँ
पर जैसे सब जगह तुम ही बस गए हो
शांत मन, सुन्दर सरोवर
खिलते हो जैसे अनंत तरुवर
किसी गहरे नाद में
तुम बजते हो
श्वास में संगीत की भांति
जैसे तुम भी वही गीत गाते हो
बंद आँख में बसता है जो सावन
उमड़ उमड़ के बरसता है मनभावन
भीगता है मेरा तन और मन
उन अमृत बिंदुओं को
जिसके लिए ये सारी दुनिया तरसती है
मैं घूंट-घूंट उसे पीये जाती हूँ
ये प्यास है मगर कि बुझती ही नहीं है....
दिनभर तुमसे जहाँ सारा, सबकुछ मांग लेता है
रात की ख़ामोशी में मैं, तुमसे केवल तुमको मांगती हूँ
जब सारा जहाँ सो रहा होता है
हे देव! मैं तब भी जाग रही होती हूँ.......!!
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