परिवर्तन का पर्व - दीपावली
पर्वों का प्रतीक है
भारतीय संस्कृति । कुछ पर्व छोटे मेलों की भाँति है तो कुछ महापर्व कुंभ के मेले
की भाँति । दीपावली ऐसे ही महाकुंभ की भाँति सांस्कृतिक मूल्यों को प्रति वर्ष अपने करीब लाने का प्रतीक पर्व
है । पुराने को ठीक करने और एकदम बिगड़ चुके को बदल देने का पर्व है दीपावली । एक
ऐसा पुण्य पर्व जिसके स्वागत हेतु न जाने कितने ही दिन पूर्व से तैयारी प्रारंभ कर
दी जाती है । प्रतीक रूप में भले ही इसके साथ व्यापार करने वाले व्यक्तियों का
लेखा जोखा ठीक करना जुडा हो किंतु वास्तव में इस पर्व की जितनी सार्थकता एक
व्यापारी के लिए है उतनी ही, अपितु उससे भी कहीं अधिक, एक सामान्य व्यक्ति के
लिए भी है । व्यापारी की दीपावली बाहरी महत्व की है जबकि शेष सभी के लिए इसका
महत्व बाहरी होने के साथ साथ आंतरिक भी है ।
यह आंतरिक दीपावली का
महापर्व चित्त के भीतर के बिगड चुके कुसंस्कारों को बदलने का अवसर है, और जो संस्कार कम होते
दिखाई देते हैं उन्हें ठीक करने का अवसर है ।
मन ने जिन रिश्तों को
पुराना मान लिया है उन्हे संवारने का अवसर है, जो रिश्ते पूरी तरह बिगड़ते
दिखाई दे रहे हैं उनके प्रति सोच को बदलने का अवसर है ।
उन विचारों में नयापन
लाने का अवसर है जिन पर परंपराओं की धूल जमा हो चुकी है, उन दुर्गुणी आवरणों को
हटाने का अवसर है जो जालों की भाँति सद्गुणों पर परतरूप में जमा हो चुके हैं ।
मन में छिपे द्वैष की
काली दीवारों को स्नेह की सफेदी से उजला करने का अवसर है । दुख की अन्धकार रूपी
छाया को खुशियों की रोशनी से बदलने का अवसर है ।
आलस्य, प्रमाद, स्वार्थपरता जैसे
पुराने बही खातों को बंद कर उल्लास, परमार्थ और सौहार्द्र के नये खातों को प्रारंभ करने
का अवसर है ।
पटाखों की संख्या को
संतुलित मात्रा में चलाकर परि-आवरण (पर्यावरण) को ठीक रखने का अवसर है तो साथ ही
स्वयं को संतुलित रखकर अन्तः आवरण को मजबूती प्रदान करने का अवसर है।
दीप पर्व वास्तव में
जलते दियों की रोशनी में संकल्पित होने का अवसर है।
संकल्प हो, बाहरी आवरण को शुद्ध और निर्मल बनाने का तथा साथ ही
साथ अंतःकरण की शुद्धता और शुचिता का भी ।
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