अनुभव या नवाचार




रवि और आदर्श जब तक अपने-अपने समय (ज़माने) को एक दूसरे के समय (ज़माने) से बेहतर बताते रहते तब तक तो सब कुछ ठीक चलता किंतु जैसे ही दूसरे के समय को अपने समय से हल्का बताने लगते तो झगडा शुरु हो जाता । दोनों का समय (ज़माना) इसलिये अलग अलग था क्योंकि रवि और आदर्श क्रमशः पिता और पुत्र थे ।
अध्यात्म की भाषा में जिसे आसक्ति कहते हैं वह यहाँ भी थी । आसक्ति मतलब लिप्त हो जाना, फिर चाहे वह वस्तुओं के लिए हो, व्यक्तियों के लिए हो या अपने समय के लिए । श्रद्धेय डॉ प्रणव पंड्या कहते हैं - "आसक्ति केवल आ सकती है, जा नहीं सकती" । कदाचित इसीलिये ये झगडा करा देती है ।
यहाँ दोनों पिता और पुत्र आसक्त थे अपने अपने समय के लिए, उस समय के साथ जुडी अन्य बातों के लिए । जहाँ रवि के पास अपने समय की पूँजी के रूप में अनुभव है, वहीं आदर्श की पूँजी उसके नवाचार और तर्क है । रवि के दृष्टिकोण में अनुभव के सामने सब बेकार है जबकि आदर्श के लिए अनुभव उस अवलंबन के समान है जो व्यक्ति को स्वावलंबी नहीं बनने देता । आदर्श के लिए नवाचार ही उसकी सम्पत्ति है और रवि के लिए नवाचार में समय लगाना समय की व्यर्थ बर्बादी है । ये झगडा वैसे तो आये दिन होता रहता था किंतु जब थोडा बढने लगता तो रवि की पत्नी बीच बचाव की कोशिश करती । ऐसे में अनुभव और नवाचार को दरकिनार कर शुरु कर दी जाती बचपन की कहानियाँ जिनमे रवि अपने बचपन को सभी सद्गुणॊं से सुशोभित प्रदर्शित करने की कोशिश करता - "मजाल थी किसी की जो पिता के सामने ऊँची आवाज में बोल भी जाए, ऐसे संस्कार थे हमारे" । उधर से आदर्श की दलील आने में भी समय नहीं लगता - "हम कौनसे संस्कार लेकर पैदा हुए थे, आप ही के तो दिये हुए हैं।"
फिर तीसरी आवाज उस पत्नी की जो माँ भी है –
"अब बस भी करो, न तो कोरे अनुभव से काम चलेगा और न कोरे नवाचार से, जैसे मेरे लिए मेरा बेटा और पति दोनों ही महत्त्व के हैं वैसे ही प्रत्येक व्यक्ति के लिए अनुभव और नवाचार भी।"
बात धीरे धीरे समाप्त हो जाती किंतु एक महत्वपूर्ण संदेश देकर जाती -
न तो सभी मान्यताएँ ही बहुत बढिया हैं और न ही उन सभी का विरोध, आवश्यकता है उस विवेक की जो दोनों (अनुभव और नवाचार) के मध्य संतुलन ला सके। (समत्वं योग उच्यते)

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