दूसरों के दुख में दुखी और खुशी में खुश!
प्रत्येक व्यक्ति अपने
को श्रेष्ठ बनाने हेतु सतत प्रयत्न करता रहता है । इस श्रेष्ठता के मानक कुछ गुण
हैं, जिनमें से एक का नाम
है संवेदना । संवेदनहीन मनुष्य उस पत्थर की भांति माना गया है जो न तो किसी हवा के
झोंके से हिलता है और न ही बारिश का पानी उस पर कोई प्रभाव डालता है । संवेदना
वह पहला गुण है जो मनुष्य के सजीव होने का परिचायक है ।
पंडित श्रीराम शर्मा
आचार्य जी कहते हैं - कोई मनुष्य कितना संवेदनशील है इस बात का अनुमान इससे लगाया
जा सकता है कि वह दूसरों के दुख को अपने दुख जैसा समझकर व्यथित होता एवं उस दुख को
बाँटने का प्रयत्न करता है अथवा नहीं । साथ ही साथ दूसरों की खुशियों को अपनी खुशी
मानकर उनके साथ उत्साहित एवं उल्लसित होता है अथवा नहीं ।
डॉ प्रणव पंड्या का
कथन है - कोई भी कर्म यदि केवल ऊपरी मन से किया गया है तो उसके होने और न होने में
प्रतीकात्मक अन्तर हो सकता है, प्रभावित करने वाला नहीं ।
निस्सन्देह दूसरों के
दुख में दुखी होना एवं खुशियों में खुश होना यदि प्रदर्शन मात्र है तो न तो उसका
परिणाम उनके लिए श्रेयस्कर होगा और न ही इसे कर्ता की संवेदनशीलता माना जा सकता है
।
वर्तमान समय के अनेकों
कष्ट और कठिनाइयों में यह एक कष्ट भी सम्मिलित है कि किसी के सुख और दुख में खुद
को सम्मिलित करने का ढोंग करने वाले तो बहुत हैं किंतु इनमें से शरीर की अंगुलियों
जितने भी वास्तविक नहीं ।
ऐसा भी नहीं कि हम इस बात
से अनभिज्ञ हैं । हम भली भाँति जानते हैं कि हमारे आस-पास रहने वाले लोगों में
अथवा हमारे अपने कहलाने वाले लोगों में चुनिंदा ही हैं जिनको हमारे सुख-दुख से
भीतरी मन से सुख-दुख होता होगा । शेष तो प्रतीकात्मक ही कहे जा सकते हैं ।
इसीलिए हम तत्परता से
हमारे जीवन से जुडी सुख-दुख की घटनाओं को अपने आस-पास की अपेक्षा उन लोगों तक
पहुंचाने को लालायित रहते हैं जिनसे हमारा जुडाव तो है किंतु लगाव नहीं ।
सोशियल मीडिया ने इस
कार्य को अधिक सहज कर दिया है । फ़ेस बुक पर लोगों के लाइक, कमेंट, शेयर की गिनती से हम
यह मान लेतें हैं कि अनेकों लोगों की भावना हमारे साथ है, जो कदाचित निरर्थक और
निराधार है ।
हरीश जी की माताजी का
निधन होने पर उनने सूचना फोटोग्राफ के साथ जब फ़ेस बुक पर प्रसारित की तो उसे 145 लाइक मिले । अब यदि
इसे लोगों की भावना अथवा संवेदना मान लिया जाए तो इसे लाइक करने वालों से अधिक
हरीश जी की मूर्खता ही माना जाएगा ।
सत्यता की जाँच करने
के लिए बाहर से अधिक भीतर देखना होगा । बाहरी स्थिति तो वीरान एवं सुनसान तलहटी
जैसी है जिसके किनारे खडे होकर एक बच्चा जोर से चिल्लाता है और अपनी ही आवाज़ की
गूंज सुनता है । इसके रहस्य को अपने पिता से पूछने पर पिताजी इतना भर कहते हैं -
"जो हम बोलते हैं, प्रकृति उसे और अधिक तीव्रता के साथ हमको लौटा देती
है"।
यह बात केवल बाहरी
प्रकृति तक ही सीमित नहीं अपितु भीतरी प्रकृति के लिए भी है । यदि हम दूसरों के
सुख-दुख में भीतरी मन से, भावनाओं से सम्मिलित हैं तो कोई कारण नहीं कि हमारे
सुख-दुख में वे सभी और अधिक तत्परता के साथ खडें ना हो ।
Comments
Post a Comment