कठिनाईयों के रास्ते से ही सच हो सकते हैं सपने
पुरानी कहावत है -
"कुछ पाने के लिए कुछ खोना ही पडता है"। कहावतों के पीछे अपनी कहानियाँ
हैं,
स्वाभाविक है कि इस
कहावत के पीछे भी होगी ही। जो भी हो किंतु इस कहावत का एक भाग है "पाना"
और दूसरा भाग है "खोना"। जितना मीठा चाहिये उतनी शक्कर डालनी पडेगी, वैसे ही जितना अधिक
पाना है उतना ही अधिक खोने की तैयारी भी करनी पडेगी।
एक निवेशक कुछ पैसे
लेकर निवेश करने के लिए ब्रोकर के पास गया। निवेशक चाहता था कि उसे अधिक से अधिक
मुनाफ़ा हो, यही
इच्छा उसने जाहिर भी कर दी। ब्रोकर ने कहा - अधिक मुनाफ़े की चाहत है तो रिस्क भी
अधिक उठानी पडेगी। निवेशक अधिक रिस्क की घबराहट में बिना निवेश किये अपने पैसे
लेकर वापस घर आ गया। आज के समय में प्रत्येक व्यक्ति के भीतर इसी प्रकार का एक
निवेशक है जो अधिक मुनाफ़े की चाहत रखता है किंतु उसमें किसी प्रकार के खोने की
रिस्क उठाने की बात से घबराहट होने लगती है। ऐसा नहीं है कि इस रिस्क का अर्थ केवल
खोना ही है, यह
रिस्क तो खोने के लिये स्वयं को तैयार करने की है।
क्रिकेट खेलने का
इच्छुक एक खिलाडी को एक बडे क्रिकेटर के साथ एक दिन बिताने का मौका मिल गया। उसका
सपना था कि वह भी उस बडे क्रिकेटर जैसा बन सके। उसके साथ एक दिन बिताने के बाद से
उस सपने को मन से निकाल दिया। कारण था उसकी सुबह से शाम तक की अनुशासित और संयमित
कठिन दिनचर्या।
ये उदाहरण केवल निवेश
अथवा खेल तक ही सीमित नहीं अपितु प्रत्येक क्षैत्र हेतु ऐसे ही हैं। बिना कठिनाई
के यदि किसी ने कुछ भी प्राप्त किया है तो कदाचित यह उसके पूर्व जन्म के संचित
प्रारब्ध का फल है अथवा यह मान लेना चाहिये कि कठिनाई कभी भी द्वार पर दस्तक दे
सकती है, उसके
लिए स्वयं को तैयार कर लेना चाहिये।
किसी भी सफ़ल व्यक्ति
के जीवन के उन पृष्ठों को पढा जाये जो उसके जीवन के खुशी के पल रहे हों तो इससे
केवल सफलता की चाहत पैदा हो सकती है किंतु उस रास्ते का पता नहीं चल सकता जिस पर
चलकर उसने अपने सपने को पूरा किया। यदि उस रास्ते का पता करना है तो उसके उन दिनों
का अध्ययन करना होगा जब-जब कठिनाईयाँ पहाड बनकर रास्ते अवरुद्ध कर रही थी।
सीखने की सबसे बडी बात
कदाचित ये है कि ऐसी कठिन घडियों में उसकी प्रतिक्रिया किस प्रकार की रही। यही
कठिन समय की प्रतिक्रिया उसके व्यक्तित्व को प्रदर्शित करती है, उसकी वास्तविक पूँजी
है,
यही उसकी पहचान भी है
और ये ही वे पृष्ठ हैं जो किसी अन्य व्यक्ति के लिए सर्वाधिक उपयोग के हैं।
इस पहचान के करीब जाने
पर पता लगेगा कि महानता की कसौटी मात्र बडे स्वप्न देखने अथवा अधिक पाने की चाहत
नहीं अपितु कठिन समय की वह तैयारी है जो कुछ भी खोने पर विचलित होने से बचा सके।
अध्ययन करने पर ज्ञात
होगा कि वे सभी व्यक्ति जो कठिन से कठिन समय में स्वयं को संतुलित रख सके, विचलित होने से बचा
सके अथवा स्थायी बन कर चल सके वे ही सच्चे अर्थों में उस शिखर को छू सके जिसका नाम
उत्कृष्टता है।
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