असंतुलन ही समस्या है




बचपन में चाय के साथ बिस्किट खाने से ज्यादा उसके खाने का तरीका याद आता है । चाय में अधिक समय तक डूबे रहने से घुलने की समस्या और कम समय तक डूबे रहने से मजा न आने की समस्या के बीच में वे लोग होते हैं जो इस कार्य में महारथ हासिल किये होते हैं। इसी महारथ का नाम है संतुलन । यही वह सम्यावस्था है जो पैंडुलम की मध्यावस्था कही जा सकती है । अस्थिरता तब तक है जब तक पैंडुलम किसी एक और है । जैसे ही मध्य में पहुंचा, स्थिरता आ जाती है । यही स्थिरता है – संतुलन ।
जन्म से लेकर मृत्यु तक हर व्यक्ति का जीवन एक पैंडुलम की भाँति चलता रहता है । इसमें से 80% वे हैं जो पैंडुलम की मध्यावस्था से "कुछ" दूरी बनाये रहते हैं, प्रत्येक व्यक्ति का "कुछ" अलग अलग हो सकता है । केवल 20% हैं जो संतुलन की अवस्था में रहते हैं । ये संतुलन की अवस्था में रहने वाले 20% ही व्यक्ति हैं,  जिनको इस विश्व की संपूर्ण खुशी के लिए धन्यवाद दिया जा सकता है ।
शेष 80% में से तो हर कोई आपाधापी में दिखाई पडता है, प्रत्येक व्यक्ति दौड रहा है । एक ऐसी दौड जो छद्म है, जिसमें मरीचिका की भाँति दिखाई देने वाली खुशी है, जो वास्तव में मात्र छलावा है । एक ऐसे काल्पनिक सुख की  दौड जिसे पाकर भी खुशी मिलेगी अथवा नहीं, कोई नहीं जानता ।
राकेश का एक ही सपना था कि उसके खाते में किसी भी तरह उसे 1 करोड रुपये देखने को मिल जाये । न दिन देखा न रात, न परिवार देखा न दोस्त, न खुद की खुशी के लिये समय न ही अपनों की खुशी के लिए, बस एक ही लक्ष्य । जिस दिन से उसने यह सपना देखा था, उस दिन से लगभग 13-14 वर्ष बाद उसका सपना भी साकार हो गया । उसके खाते में उसे अपने ही 1 करोड रुपये देखने को मिल गये । उसे किसी ने पूछा, ये खयालात कहाँ से पैदा हुए । अब राकेश याद करने लगा तो उसे याद आया कि उसे अपने ही समान व्यापार करने वाले किसी व्यक्ति ने चुनौती दी थी, और उसने तब से ठान लिया था 1 करोड जमा करने का । अफसोस केवल इस बात का था कि वह सज्जन अब गायब हो चुके थे । राकेश को खुशी तो बहुत हुई अपने खाते में इतना पैसा देखकर, किंतु यह खुशी अधिक समय तक टिकने वाली कहाँ थी। अब उसे खुद ही लगने लगा - "मैंने अपने जीवन के स्वर्णिम समय को ऐसे ही खर्च कर दिया, न कोई दृष्टिकोण था न ही कोई दिशा । बस एक अदूरदर्शी लक्ष्य लेकर निकल पडा था ।"
अच्छा हुआ कि राकेश को इस बात का बोध देर सवेर हो ही गया । उसने अपनी जीवन शैली में आवश्यक परिवर्तन कर भी लिए, अन्यथा जानकारी हो जाने के बाद भी स्वीकार कर लेना बडा ही मुश्किल कार्य है । हालांकि बीता हुआ समय वापस नहीं आ सकता, राकेश इस बात को भली भाँति जानता था । ऐसा नहीं है कि पैसा कमाना गलत था किंतु केवल पैसा कमाना तो गलत ही था । यही "केवल" व्यक्ति को या तो पैंडुलम के बायें ले जाता है अथवा दायें, जिस भी ओर ले जाये देगा तो असंतुलन ही । जब तक असंतुलन है तब तक व्यक्ति
- अदूरदर्शी बना रहेगा
- लक्ष्यविहीन की भाँति कभी पैंडुलम के एक ओर तो कभी दूसरी ओर दिखाई देगा
- निर्णय लेने की क्षमता विकसित नहीं कर सकेगा
- छद्म खुशी के लिए सतत दौडता रहेगा
- अपनों की भीड में भी अकेला दिखाई देगा
समय के साथ ऐसे अनेक परिणाम देखे जा सकते हैं जिनमें अंतिम रूप में जो भी मिले उसे "खुशी" की संज्ञा नहीं दी जा सकती ।


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