कागज पे कुछ लिखना चाहती हूँ
क्या लिखूं, कैसे लिखूं, कुछ समझ नहीं पाती हूँ,
पढ़े और लिखे सारे शब्दों में घूम आती हूँ,
मगर
किसी भी शब्द को ठीक नहीं पाती हूँ,
शब्द संज्ञाएँ जैसे बेमानी हो गई हैं,
कबीर के ढाई आखर की कहानी भी अब कहानी हो गई है,
जैसे शब्द ही कोई नया गढ़ना चाहती हूँ,
मैं आज भी कागज पे कुछ लिखना चाहती हूँ.......
पढ़े और लिखे सारे शब्दों में घूम आती हूँ,
मगर
किसी भी शब्द को ठीक नहीं पाती हूँ,
शब्द संज्ञाएँ जैसे बेमानी हो गई हैं,
कबीर के ढाई आखर की कहानी भी अब कहानी हो गई है,
जैसे शब्द ही कोई नया गढ़ना चाहती हूँ,
मैं आज भी कागज पे कुछ लिखना चाहती हूँ.......
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