मन गई दीपावली ?
5 दिन का त्योहार, कब आया, कब गया पता ही नहीं
चला। जो भी हो, दीपावली
का त्योहार बड़ा ही मज़ेदार होता है। ढेर सारी छुट्टियाँ, ढेर सारे पटाखे, कितने ही तरह के पकवान, बडों से मिलने वाले
ईनाम, नए
नए कपडे, सभी
का एक दूसरे के घर आना जाना और भी न जाने क्या क्या। बच्चों से लेकर बडों तक, सभी के लिये यह पर्व
खुशियों का एक बड़ा भंडार खोल देता है। बाज़ार की रौनक तो देखते ही बनती है। जो लोग
घर बैठे ही सभी सामान मंगवाने की चेष्टा रखते हैं, वे भी इस त्योहार पर किसी
न किसी बहाने चले ही जाते है बाज़ार और कुछ न कुछ खरीद ही लेते हैं बाज़ार से।
बच्चों की दीवाली पटाखों से, गृहिणियों की घर में बनने वाले पकवानों और घर की साज
सज्जा से, वयस्क
पुरुषों की कुछ नया खरीदने से और बडे बुजुर्गों की दीवाली घर परिवार के सभी लोगों
से मिलजुल कर मनती है। इसलिए ही सभी के चेहरे खुशी से चमक रहे थे, शायद सभी ने अपनी अपनी
मनमर्जी की दीपावली मना ली थी।
किन्तु हमारे पड़ौसी
मिश्रा जी घर के बाहर खडे होकर आने जाने वाले हर व्यक्ति से पूछते - मन गई दीपावली? सभी का जवाब
"हाँ" ही होता था क्योंकि अब तो दीपावली को बीते हुए 3 दिन हो चुके थे। जब
भी मिश्रा जी लोगों से ये सवाल करते मुझे बड़ा आश्चर्य होता। जब पता है कि दीपावली
खत्म हो चुकी है तो ये सवाल पूछने का क्या औचित्य - "मन गई दीपावली"? जब मुझसे रहा न गया तो
मैं मिश्रा जी के पास गया और उन्होंने मुझ पर भी वही प्रश्न दागा - "मन गई दीपावली"? मैंने कहा, आप ये अजीब सवाल क्यों
पूछते हैं लोगों से जब आपको पता है कि इसका जवाब सीधा सीधा हाँ है। मिश्रा जी शायद ऐसे ही किसी मौके का इंतज़ार
कर रहे थे, वे
चाहते थे कि कोई उनसे आकर ये पूछे।
मिश्रा जी ने कहा -
तुमने नए कपड़े खरीदे, नए पटाखे जलाए, मिठाइयाँ भी खाई, कुछ लोगों से मिल कर
हंसी खुशी अपने में मस्त 5 दिन बिता लिये, ऐसे ही मनी न तुम्हारी
दीवाली?
तो और कैसे मन सकती है, मैंने तपाक से प्रश्न
किया।
मिश्रा जी ने आगे
प्रश्नों की झड़ी लगा दी -
- क्या पांच दिन के इस
त्योहार पर ऐसा एक भी व्यक्ति है जिसके चेहरे पर तुम्हारे कारण दीवाली की खुशी
दिखाई दी?
- क्या तुम्हारे घर के
नौकर और नौकरानी ने भी तुम्हारे साथ दीप जलाए?
- क्या तुम्हारे नौकर
या ड्राइवर के बच्चे ने भी दीवाली पर नए कपड़े पहने?
- तुम्हारी दीवाली में
तुमसे कमजोर वर्ग के कुल कितने लोग तुम्हारे साथ थे?
- क्या तुम्हारे
पिताजी ने अपनी दुकान के नौकर को छुट्टी दी इस त्यौहार को मनाने के लिए?
- क्या तुमने जितना
प्रदूषण फैलाया है उसको ठीक करने का कोई इंतजाम सोंचा है?
- क्या तुमने धन्वंतरि
जयंती पर अपने आप को, अपने घर को और अपने देश को स्वच्छ और स्वस्थ रखने का
संकल्प लिया है?
- क्या तुमने लक्ष्मी
पूजन के समय धन को संयमित तरीके से उपयोग करने का संकल्प लिया है?
- क्या तुमने गोवर्धन
पूजन के साथ गांव की संस्कृति को बचाने की कोई बात सोची है?
इससे पहले कि वो मुझ पर
प्रश्नों के और अधिक गोले दागते, मैं वहाँ से चला आया, यही सोंचते हुए कि -
क्या वास्तव में "मन गई दीपावली"?
अपनी खुशी के लिए कुछ करना
कोई अपराध तो नहीं किंतु केवल अपनी ही खुशी की बात सोचना तो अपराध की श्रेणी में
आता ही है। बढ़िया तो यह हो कि हम अपने लिये और दूसरों के लिये सोचने में कुछ
संतुलन रख सकें।
bahut badhiya
ReplyDeleteअरे वाह आप तो बहुत अच्छा लिखती है बहुत अच्छा सोचती हैं कितना अच्छा हो हर व्यक्ति इसी तरह की सोच लेकर जीवन में आगे बढ़े कितना अच्छा हो ऐसा दिल सब के पास हो चलो कुछ ऐसा करें कि हमारे बच्चों को हम ऐसे ही संस्कार दें ऐसा ही दिल दे ऐसी ही समझ दे ं
ReplyDeleteआपका ऐसा प्रभावी प्रयास निरंतर रहे। इसी के साथ आपको बहुत-बहुत शुभकामनाएं
Very nice madam, even I have a point of view about Deepawali, we must educate our children about this festive by teaching Ramayana and correlating with present scenario. Like
ReplyDeleteA) Education doesn't make you a good person, you have have inner conscious to make education a tool for better society. Like Ram and Ravana both are highly educated but Rama was good guy and Ravana was not. You can be corrupted police or IT officer or a bad doctor or a teacher although you are educated enough.
B) Your family tree doesn't define you, Like Kakiye the Rama mother is a evil character but Vibashana was a good one, so ones personal identify matter not family background.
Like wise we must teach our children what actually Ramayana is all about.