प्रथम आना महत्वपूर्ण है या ईमानदार होना ?

 

सुरभी मेम कक्षा छठी के बच्चों को हिन्दी पढ़ा रही थी।

पाठ था ईमानदारी । 

विभिन्न उदाहरणों के माध्यम से सुरभी मेम ने बताया कि ईमानदारी का गुण क्यों मनुष्य जीवन में उच्च स्थान रखता है तथा कैसे उसे आत्मसात किया जा सकता है। उन्होंने अपनी तरफ से आज का पाठ समाप्त कर बच्चों से पूछा कि यदि उनके मन में कोई प्रश्न है तो वे पूछ लें।

शुभांग जो कि बहुत ही गौर से सब-कुछ सुन रहा था उसने अपना हाथ उठाया और पूछा, "प्रथम आना महत्वपूर्ण है अथवा ईमानदार होना?"

प्रथम आने वाले लोग ईमानदार भी होते हैं, मेम ने कहा।

किन्तु पिताजी कहते हैं कि कमिश्नर साहब प्रथम आए थे परन्तु वे तो रिश्वत भी लेते हैं?

सुरभी मेम ने दो मिनट के लिए मौन साध लिया और पिछले दिनों अखबार की खबरें उनके जेहन से एक एक कर गुज़रने लगी। इतने में ही घंटी बज गई और वो अपने विचारों से लौटकर कक्षा में आईं। तथापि अगली कक्षा विज्ञान विषय की थी लेकिन सुरभी मेम को ईमानदारी के इस पाठ को अधूरा छोड़कर जाना अनुचित लगा और उन्होंने सुमित सर से प्रार्थना की कि वे आज का अपना कालांश उन्हें दे दें ।

सुरभी मेम ने छात्रों से मुखातिब होते हुए कहा कि वे उन्हें एक वास्तविक जीवन की बात बताने जा रही है उसके बाद छात्र स्वयं ये तय कर सकेंगे कि प्रथम आना महत्वपूर्ण है अथवा ईमानदार होना।

उन्होंने तब पिछले वर्ष नवीं कक्षा में पढ़ने वाले प्रतिभाशाली छात्र सारंग की बात बताना प्रारम्भ किया। अध्यापिका ने बताया कि सारंग बहुत ही होनहार विद्यार्थी था। विद्यालय की समस्त गतिविधियों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेता था तथा कक्षा में सदैव अव्वल भी रहता था। सभी के साथ विनम्रता और प्रेम से रहना, सदैव दूसरों की मदद करना, किसी भी कार्य की जिम्मेदारी लेने को तत्पर रहना जैसे उसके स्वभाव का हिस्सा था इसलिए सारंग सभी अध्यापकों का चहेता भी था और छात्रों में लोकप्रिय भी।

वार्षिक परीक्षा में विज्ञान के परीक्षा पत्र में उसे एक प्रश्न नहीं आता था और अध्यापक को यह ज्ञात हो गया। सारंग जैसा होनहार केवल एक प्रश्न के कारण द्वितीय स्थान पर चला जाएगा ऐसा सोचकर कक्षाध्यापक ने उसे उस प्रश्न का उत्तर बता दिया।

परीक्षा समाप्त हुई। विद्यालय में परीक्षा परिणाम तैयार किया जा रहा था। विज्ञान विषय के शिक्षक सुमित सर  विषयाध्यापकों के बीच बात कर रहे थे और उन्होंने बताया कि सारंग ने तीन नम्बर का एक प्रश्न छोड़ दिया था और उन्हें डर है कि इस कारण कहीं वो इस बार अपना स्थान ना खो दे।

कक्षाध्यापक भी सारी बात सुन रहे थे और हैरान भी थे कि आखिर सारंग ने उत्तर बता देने के बाद भी उत्तर लिखा क्यों नहीं?

परीक्षा परिणाम घोषित किया गया और सारंग इस बार वास्तव में द्वितीय स्थान पर था । वैसे तो सभी के लिए यह हैरानी की बात यह थी कि वो तीन नम्बर से ही पीछे था जो विज्ञान में खोए।

किन्तु इस बात से सबसे अधिक प्रभावित कोई था तो वो सारंग के कक्षाध्यापक। उन्होंने आखिर में सारंग को बुलाकर पूछ ही लिया कि उसने वो उत्तर क्यों नहीं लिखा जो उन्होंने बताया था? क्यों उसने तीन नम्बर का नुक़सान कर प्रथम स्थान छोड़ दिया?

सारंग ने बहुत ही विनम्रता से माफी मांगते हुए कहा कि उसने ईमानदारी को प्रथम स्थान पर रखा इसलिए वो उनका बताया हुआ उत्तर नहीं लिख पाया। 

कक्षाध्यापक ने सत्र के प्रारम्भ में प्रथम दिवस की प्रार्थना सभा में सभी को इस सम्पूर्ण घटनाक्रम को बताया तथा सारंग की ईमानदारी की प्रशंसा की। अब तक सारंग केवल सभी का चहेता था किन्तु अब विद्यालय में सभी लोग सारंग का आदर भी करते थे।

यदि आपके पास इस प्रश्न का उत्तर है तो कृपया साझा कीजिए।

Comments

  1. बहुत शानदार बड़ी दीदी।
    ईमानदारी जीवन में व्यक्ति की परछाई की तरह होती है। जो उसे अपने जीवन में अपनाता है वह उसे आत्मसम्मान और आत्मविश्वास से लबरेज करती है।
    और व्यक्ति उसे त्यागता है जो वह आत्मा रहित हाड़ मांस का ढांचा बन रही जाता है।
    आपकी ईमानदारी आपको सदैव ईश्वरीय वरदान सत्य का साक्षात्कार अवश्य करती है।

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  2. जीवन में ईमानदारी को सदैव प्राथमिकता देनी चाहिए। ईमान दारी ही हमारी परमात्मा प्रदत्त पूंजी है। जिसके दम पर हमारे चरित्र का निर्माण होता है। जो व्यक्ति किसी भी परिस्थिति में ईमानदारी को भुना देता है उसे पुनः कभी नहीं मिलती है।

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  3. ईमानदारी की परिभाषा शायद यही है कि दुनिया को आपका वास्तविक रूप प्रकट हो जो वास्तव मे आप हो।

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