नैतिक मूल्यों की आवश्यकता

 

नैतिक मूल्यों के विकास की आवश्यकता और विकास एवं संरक्षण कैसे किया जाए इस विषय पर चर्चा की जानी थी

      मुझे एक कहानी याद आ गई जो मैंने एक पुस्तक "मैं विद्यालय बोल रहा हूँ" में पढ़ी थी

     कहानी कुछ ऐसी थी कि एक व्यक्ति को चोरी और हत्या के मामले में फांसी की सजा सुनाई गई

     जेलर ने उससे पूछा कि क्या उसकी कोई अंतिम इच्छा है

     उस व्यक्ति ने कहा कि वो अपनी माँ  से मिलना चाहता है

     जब उसकी माँ उससे मिलने आई तो उसने पास आते ही अपनी माँ को एक जोरदार तमाचा मारा | जेलर ने उसे पकड़ कर दूर किया और कहा भला अपनी माँ को कौन मारता है

    जब उससे पूछा गया कि उसने अपनी माँ को क्यों मारा तो उसने कहा कि बचपन में जब पहली बार उसने अपने दोस्त का पेन चुराया तो उस दोस्त को पता चल गया कि वो पेन मैंने चुराया था | वो दोस्त अपने पिता के साथ शाम को मेरे घर आया | मैं तो बहुत डर गया था कि आज मुझे बहुत सज़ा मिलेगी | लेकिन मेरी माँ ने उल्टा उनको ही सुनाया और इस तरह भीतर आई जैसे कोई जंग जीत कर आई हो

     लेकिन ये जानते हुए भी कि मैंने उसका पेन चुराया था माँ ने मुझे कुछ भी नहीं कहा | अगर ये तमाचा मेरी माँ ने मुझे समय रहते ही मारा होता तो शायद आज मैं अपराधी नहीं होता

   मैं जानता हूँ कि माँ को तमाचा मार कर मैंने अपराध किया है लेकिन ये अपराध मैंने इसलिए किया है ताकि ये बात हर उस माँ तक पहुंचे जो बच्चो की गलतियों पर उन्हें समझाने के बजाय छुपाने को अपना प्यार समझती है और फिर कोई बच्चा मेरी तरह अपराधी नहीं बने

 

     स्मार्ट फोन और आर्टिफिशल इंटेलिजेंस के समय में मानवीय सभ्यता को सुरक्षित रखने एवं आगे बढ़ाने के लिए अत्यंत आवश्यक है कि मानव में नैतिक मूल्यों का विकास सुनिश्चित हो | हमारे राष्ट्र ने जगद्गुरु की भूमिका निभाई है एवं संसार को मनुष्य जीवन का अर्थ देकर मोक्ष का मार्ग भी सुझाया है | किन्तु ऐसे श्रेष्ठ भारत के नागरिकों में पिछले कुछ दशकों में नैतिक मूल्यों की गिरावट देखी जा सकती है | स्व से प्रारम्भ होकर स्व पर ख़त्म हो जाना और किसी का भी जीवन हो सकता हैं पर भारतवंशियों का नहीं


आज हमारा इस विषय पर बात करना ही यह सिद्ध करता है कि नैतिक मूल्य मनुष्य जीवन की आवश्यकता है | किन्तु इस आवश्यकता पर आज सिमित दायरे में बात की जा रही है, उद्देश्य की पूर्ति हेतु इसकी सीमाओं को विस्तृत करना होगा | ऐसा सुना है कि बात करने से बात बनती हैं उदहारण के लिए डॉ साहब का विचार एक गोष्ठी के रूप में दिखाई दे रहा है और यदि हममे से प्रत्येक व्यक्ति उनके स्तर का चिंतन मनन कर एक कदम आगे बढ़ाए तो विस्तृत स्वरुप देखा जा सकता है
कार्य विधा-

 

      परिवार और माता पिता - भावी पीढ़ी को गढ़ने के लिए दो इकाईयाँ और तीन लोग सबसे महत्वपूर्ण है एक परिवार और माता - पिता तथा दूसरी विद्यालय और शिक्षक | आज की भागती दौड़ती रेस में माता पिता अक्सर ये कहते हुए पाए जाते हैं कि वे दोनों ही कार्यरत है इसलिए बच्चों के लिए समय नहीं मिलता

      परिस्थितियां जो है वो ही है और वे तब तक नहीं बदल सकती जब तक हम स्वयं उन्हें बदलने का निर्णय नहीं लें | यदि मुलभूत आवशयकताएँ पूरी करने के लिए आप दोनों कार्यरत हैं तो समय की कमी जैसा प्रश्न आएगा ही नहीं और यदि आप और अधिक की दौड़ में शामिल हैं तो कभी अंत आएगा ही नहीं स्वयं को justify करने के लिए अभिभावक ये कह कर अपनी बात को पूर्ण विराम भी देते हैं कि सबकुछ बच्चों के लिए ही तो कर रहें हैं | ज़रा ठहरिये और अपने दिल पर हाथ रखकर फिर सोचिये | यदि हम बच्चों से उनकी इच्छा जानना चाहे तो वे सदैव अभिभावकों का समय, साथ और स्नेह चाहेंगे

      यदि आपने ये निर्णय लिया है कि आप माता-पिता बनने के लिए तैयार है तो निश्चित रूप से इस निर्णंय पर भी पहुँचे ही होंगे कि आप दौड़ने में से कौन लेगा परवरिश की जिम्मेदारी और यदि आप इस निर्णय तक नहीं पहुंचे हैं तो माफ़ कीजिये आप अभी माता पिता बनने के लिए तैयार नहीं हैं | जिस बच्चे को आपने जन्म दिया उसकी जिम्मेदारी लेने के लिए आपको समय नहीं है तो किसके पास है ? दूसरी बात ये कि एक बच्चा केवल अपने पेरेंट्स का एक बच्चा ही नहीं होता वरन वो राष्ट्र की अमानत  है आपके पास जिससे ये आशा की जाती है कि वो कल एक जिम्मेदार नागरिक बने


विद्यालय और शिक्षक: लिखते हुए अच्छा तो नहीं लग रहा किन्तु सत्य को झुठलाया भी तो नहीं जा सकता | शिक्षक एक समय में समाज को दिशा देने वाला एकमात्र व्यक्तित्व हुआ करता था किन्तु भौतिक संसार की चकाचौंध से वो बच नहीं पाया या यूँ कहे कि समाज की " जिसके पास पैसा बड़ा वो आदमी बड़ा" की गलत परिभाषा को उसने भी अपना बना लिया और अर्थ दिया |


किन्तु अच्छी बात यह है कि कुछ लोग अभी भी सच्चे शिक्षक के रूप में जाने जाते हैं और यही चुनिंदा शिक्षक अपने जीवन को उदाहरण की भांति प्रस्तुत कर अपने प्रयासों से वास्तविक बदलाव ला सकते है और कहना ना होगा कि उसके लिए प्रत्येक विद्यालय के मिशन/उद्देश्यों में नैतिक मूल्यों के विकास को सन्निहित किया जाना चाहिए, शैक्षणिक सत्र के प्रारम्भ में सभी शिक्षकों और विद्यार्थियों से मिशन/उद्देश्यों को साझा किया जाना चाहिए | नैतिक मूल्यों का विकास करने के लिए विविध कार्यक्रम आयोजित किये जा सकते हैं अधिक महत्वपूर्ण है कि इस आधार पर छात्रों और शिक्षकों को पुरस्कृत भी किया जाए ताकि ये एहसास जगाया जा सके कि विज्ञान के युग में भी नैतिक मूल्यों का उतना ही महत्व है जितना कि विज्ञान का | | 


१. प्रार्थना सभा को भी उतना ही महत्व दिया जाए जितना गणित और अंग्रेजी की कक्षा को
२. कहानियां जीवन की प्रेरक है और कहानियों के माध्यम से ही बच्चे सबसे अधिक सीखते हैं अत: कहानियों को सीखने के समय का हिस्सा बनाया जाए
३. छात्रों को पढ़ने के लिए सद्साहित्य छोटी उम्र से ही दिया जाए | बचपन में जो सीख एकबार लग जाती है वो उम्रभर साथ चलती है
४. फेंसी गतिविधियों के स्थान पर सार्थक रचनातमक गतिविधियों का आयोजन किया जाए | 
५. प्रार्थना सभा में प्रशंसा का सत्र नियमित हो जिसमे उन बच्चों को पहचान मिले जो किसी की मदद करते हैं, ईमानदारी दिखाते हैं, सच बोलते हैं आदि
६. शैक्षणिक और सह-शैक्षणिक गतिविधियों में संतुलन हो | केवल शैक्षणिक अंकों के आधार पर जो वाहवाही हैं वो वास्तविक जीवन में बहुत महत्त्व नहीं रखती क्योंकि प्रत्येक जीवन के प्रश्न भी भिन्न होते हैं और उत्तर भी जो कि स्वयं को खोजने होते हैं शिक्षा वही सार्थक है जिसे समाज से जोड़ा जाए अन्यथा वो शिक्षा केवल डिग्री तक एवं वो शिक्षित अपनी आजीविका अथवा अपार धनार्जन तक ही सिमित रहेगा
7.
जन संपर्क को बढ़ावा दिया जाए सभी मिलकर आवश्यक रूप से साप्ताहिक एक घंटे का समयदान करें जिसमे जनसम्पर्क के कार्यक्रमों को नियमित किया जाए | सामूहिक शक्ति बढाने के लिए साथ बैठना प्रारम्भ करें जिससे आत्मीयता तो बढ़ेगी ही विषय विशेष पर चर्चाएं भी की जा सकेगी


यदि हम नंबरों की रेस से बाहर निकलकर सार्थकता पर काम करने लग जाए तो बहुत सा धन एवं समय बच जाता है जिसे नैतिक मूल्यों के विकास, संरक्षण एवं लोक कल्याण के कार्यों में खर्च किया जा सकता हैं | विद्यालय केवल अपने तय उद्देश्यों की पूर्ति हेतु कटिबद्ध हो जाए तब भी बदलाव के मार्ग तो स्वत: ही निकल आएँगे


सामाजिक संगठन: नैतिक मूल्यों के प्रचार के लिए सामाजिक संगठनों का सहयोग लिया जा सकता है। इन संगठनों के माध्यम से विभिन्न समुदायों में नैतिक जागरूकता बढ़ाई जा सकती है। सामुदायिक सभाएंऔर कार्यशालाएं आयोजित की जा सकती हैं जो नैतिक मूल्यों को प्रमोट करती हैं। किन्तु इस सबसे पूर्व हमें गतिविधियों के माध्यम से लोगो से संपर्क बढ़ाना चाहिए

     We follow a phrase in teaching ie 'connect before you correct" जो जन संपर्क और किसी भी जागरूकता के कार्यक्रम के लिए भी आवशयक है फिर चाहे वो स्वच्छता हो, व्यसन मुक्ति हो अथवा शिक्षा | आप किसी से जाकर ये कहेंगे कि कल से गली में कचरा मत डालना या ये की  शपथ लो कि शराब नहीं पीओगे तो आपकी बात को कोई क्यों माने ? किन्तु किसी से आप जुड़ते हैं और साथ बैठकर नियमित बातचीत करते हैं तो व्यक्ति आपकी बात मान ले इसकी संभावनाएं बढ़ जाती है | ये है कि हम जिन्हे बदलना चाहते हैं उनको अलग छोड़कर नहीं साथ लेकर चलें


नैतिक कथाएँ: नैतिक कथाएँ और किस्से सुनाकर, नुक्कड़ नाटकप्रभात फेरी, सामूहिक नृत्य, गीत आदि के माध्यम से भी नैतिक मूल्यों को प्रमोट किया जा सकता है। इन कथाओं के माध्यम से जीवन के मूल्यों और नैतिकता की महत्वपूर्ण सीख मिलती है।
 
सार्वजनिक संवाद: सार्वजनिक संवाद के माध्यम से नैतिक मुद्दों पर चर्चा की जा सकती है। मीडियासोशल मीडियाऔर सार्वजनिक चर्चा के प्लेटफ़ॉर्म के माध्यम से लोगों के बीच नैतिक विचारों को साझा किया जा सकता है।
 
अनुकरणीय व्यक्तित्व और उदाहरण: प्रेरणा स्रोत बुद्धिजीवी लोग अपने जीवन से उदाहरण प्रस्तुत कर सकते हैं। वे नैतिक मूल्यों को अपने आचरण और निर्णयों के माध्यम से प्रमोट कर सकते हैं।
 
श्रेष्ठ उपलब्द्धियाँ: नैतिक मूल्यों को प्रमोट करने के लिए अच्छे कामों और श्रेष्ठ उपलब्धियों को साझा किया जा सकता है। अपने आस पास देखने से लोग वास्तविक अनुभव से सीखते हैं और प्रेरणा भी लेते हैं

 
जन संपर्क एक सशक्त माध्यम हो सकता है यदि इस दिशा में एक कदम आगे बढ़ाया जाए | नैतिक मूल्यों का विकास और प्रचार समाज में साझा करेंताकि समाज के लोग उसका महत्त्व समझ सकें और उनका पालन कर सकें। 

 

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