गर्म रोटियां

 मां और पिताजी शाम का भोजन करने के बाद रोज की तरह अपने कमरे में जा चुके थे। विद्रुप टीवी देखते हुए अपने आफिस की कुछ फाइल्स देख रहा था और बेटा अक्षांश दादा दादी के कमरे में खेल रहा था।

रोज की तरह सभी को खाना खिला कर वर्तिका अभी अपनी प्लेट लेकर खाना खाने बैठी ही थी कि...

अक्षांश ने कमरे से ही आवाज लगाई मां....दादी की दवाई नहीं मिल रही कहां रखी है?

वर्तिका ने अपने हाथ में लिए कौर को वापस प्लेट में रखा और दवाई देने चली गई।

लौटकर जब बैठी तो डोरबेल बजी और वो भगोनी उठाकर दूध लेने चली गई।

वर्तिका ने दूध गैस पर चढ़ाया और फिर तसल्ली से खाना खाने बैठ गई।

तभी अक्षांश दौड़ता हुआ आया, मां मेरी रीडिंग बुक नहीं मिल रही है।

वर्तिका ने कहा कि वो उसकी बुक रैक की सेंकैड राॅ में रखी है लेकिन अक्षांश ने ये कह कर मना कर दिया कि उसने देखा वहां, बुक नहीं थी । वर्तिका उठी और उसकी किताब ढुंढने जाने लगी।

विद्रुप कदाचित आज कुछ जरुरी काम नहीं कर रहा था या फिर आज वो घर में होते हुए घर में भी था शायद इसीलिए ये सारा घटनाक्रम देख और समझ रहा था । विद्रुप उठकर आया और उसने वर्तिका से कहा कि वो खाना खा ले अक्षांश की किताब वो ढूंढ देगा।

वर्तिका खाना खाने बैठ गई।

अगले दिन शाम को डाइनिंग टेबल पर दादा दादी और अक्षांश खाना खाने बैठे तो पिताजी ने कहा विद्रुप को भी आ जाने देते। वर्तिका ने बताया कि वो आज देरी से आएंगे लेकिन तभी बेल बजी और विद्रुप भी उसी समय आफिस से लौट आया। 

वर्तिका ने रोज की तरह उसका बैग और टिफिन लेने के लिए हाथ बढ़ाया किन्तु आज विद्रुप ने अपना सामान उसे नहीं दिया वरन् स्वयं ही यथास्थान पर रखा और आते ही वर्तिका को एक कुर्सी पर बिठाया और कहा कि आज से वो भी सभी लोगों के साथ बैठकर गर्म खाना खाया करेगी और इस बात पर पिताजी ने भी अपनी खुशी जाहिर की।

जाने कितने वर्षों से वर्तिका जैसी कितनी ही गृहिणियों ने  इन परिस्थितियों को अपने जीवन जीने का तरीक़ा बना लिया। किन्तु सत्य तो यह है कि प्राचीन काल में एक व्यवस्था ऐसी पढ़ने में आती है कि घर की लक्ष्मी परिवार के सभी सदस्यों को भोजन कराने के बाद ही खाना खाएं। जिसमें द्रौपदी के भोजन कर लेने के पश्चात पात्र के खाली हो जाने की कहानी भी पढ़ी। 

सभी को गर्म रोटी खिलाने के नाम पर साथ नहीं खाना अथवा सभी के खाने के बाद खाना जो भी हो प्रारम्भिक अवस्था में उसे ऐसा इसलिए करना पड़ता है कि उसके बड़ों ने उसे ये सिखाया होता है। फिर करते-करते उसकी आदत में आ जाता है सभी के लिए भागते दौड़ते रहना और अपने को किनारे कर देना। और समय के साथ वो भूल भी जाती है शायद सुकून से दो घड़ी ख़ुद के साथ बैठना। सच तो ये है कि वो अपने लिए exist ही नहीं करती क्योंकि वो कहीं खो चुकी है कभी इस्त्री होते कपड़ों में तो कभी बच्चों के खिलौनों में। कभी चाय बनाने के साथ साथ बर्तन धोने में तो कभी दवा ढूंढने में, खो चुकी होती है उसकी अपनी हंसी और ख़ुशी तुम्हारे चेहरों की हंसी खुशी बरक़रार रखने में। और ऐसा भी नहीं है कि उसे इंतज़ार है किसी विद्रुप का अब जिसे एहसास होगा किसी दिन कि जो गर्म रोटियां सेंक कर सभी को खिलाती है उसे भी अधिकार है वो गर्म रोटियां खाने का।

क्योंकि कितनी ही वर्तिका का जीवन तो पूरा हुआ मगर किसी को उसके होने का अहसास नहीं हुआ। अब विद्रुप को ही देख लो जो सालों से चल रहा था उसके घर में उस पर आज पहली बार उसका ध्यान गया । बात गर्म या ठंडी रोटी की तो है ही नहीं मगर बात ये तो है ही कि हम उसे कितना समझते हैं। 

चलो एक वर्तिका को परिवार में मान मिला, उसके ब्राह्मणत्व को जीते जी सम्मान मिला ये ही क्या कम है।

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