प्रेम मुक्त करता है.....


शब्द संसार नहीं सुहाता
मुझे मेरा मौन अब अच्छा लगता है,
लोगो की भीड़ भली नहीं लगती
मुझे मेरा एकांत अब प्रिय लगता है,
ज्ञान के मकडजाल में दम घुटता है मेरा
आँख का अनवरत अश्रु बहाना सुखद लगता है,
तुमसे भी बतियाने का मन नही करता अब
बस तुम्हे अहसास में जीना प्रिय लगता है,
तेरे इस संसार में सार नहीं दिखता
श्वास में समाया तेरा विस्तार सुकूं देता है,
कायनात भी मिले मुझे तो चाहत नहीं उसकी
एक तेरा भीतर गहराना उपलब्द्धि देता है,
ग्रंथों ने बहुत ग्रंथियां बाँधी है अब तक
मगर
हे शिव !
तेरा ये 'प्रेम' मुझे अब मुक्त करता है !

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