कहीं हम भी अपराधी तो नहीं.......
नहीं जी रहे अगर देश के लिए तो अपराधी हो
चाहे जो हो धर्म तुम्हारा चाहे जो वादी हो ।
नहीं
जी रहे अगर देश के लिए तो अपराधी हो ।
जिसके
अन्न और पानी का इस काया पर ऋण है
जिस समीर का अतिथि बना यह आवारा जीवन है
जिसकी माटी में खेले, तन दर्पण-सा झलका है
उसी
देश के लिए तुम्हारा रक्त नहीं छलका है
तवारीख
के न्यायालय में तो तुम प्रतिवादी हो ।
नहीं
जी रहे अगर देश के लिए तो अपराधी हो ।
जिसके
पर्वत खेत घाटियों में अक्षय क्षमता है
जिसकी नदियों की भी हम पर माँ जैसी ममता है
जिसकी गोद भरी रहती है, माटी सदा सुहागिन
ऐसी
स्वर्ग सरीखी धरती पीड़ित या हतभागिन ?
तो
चाहे तुम रेशम धारो या पहने खादी हो ।
नहीं
जी रहे अगर देश के लिए तो अपराधी हो ।
जिसके
लहराते खेतों की मनहर हरियाली से
रंग-बिरंगे फूल सुसज्जित डाली-डाली से
इस भौतिक दुनिया का भार ह्रदय से उतरा है
उसी
धरा को अगर किसी मनहूस नज़र से खतरा है
तो
दौलत ने चाहे तुमको हर सुविधा लादी हो ।
नहीं
जी रहे अगर देश के लिए तो अपराधी हो ।
जीवन
का है अर्थ तभी तक जब तक आज़ादी हो ।
नहीं
जी रहे अगर देश के लिए तो अपराधी हो ।
चाहे
हो दक्षिण के प्रहरी या हिमगिरी वासी हो
चाहे राजा रंगमहल के हो या सन्यासी हो
चाहे शीश तुम्हारा झुकता हो मस्जिद के आगे
चाहे
मंदिर गुरूद्वारे में भक्ति तुम्हारी जागे
भले
विचारों में कितना ही अंतर बुनियादी हो ।
नहीं
जी रहे अगर देश के लिए तो अपराधी हो ।
– उदयप्रताप सिंह
कविता की एक एक पंक्ति आज के परिप्रेक्ष्य में भी
पूरी तरह से लागू होता है| सहज, सरल और सीधे अपनी भावनाएं ही व्यक्त नहीं की बल्कि एक संवाद
किया है| जो कल भी समकालीन था, आज भी है और आगे भी रहेगा |
जिस माटी में खेले हैं,
जिसका अन्न खाया है और जिसका
पानी पिया है उस देश के लिए अगर हम नहीं जी रहे हैं तो हम अपराधी
हैं | अर्थात डाका डालना, हत्या करना या किसी को नुक्सान पहुँचाना ही
अपराधी नहीं बनाता, आप तब भी अपराधी है जब आप देश के लिए नहीं जी रहें हैं| चाहे जिस धर्म के हैं हम या किसी भी क्षेत्र से, अमीर, गरीब, राजा अथवा सन्यासी जो भी हों सभी के लिए आवश्यक है कि राष्ट्र उनके लिए सर्वोपरि हो|
हम स्वयं को कितने ही तुच्छ खण्डों में विभक्त किये बैठे हैं और कवि की कविता
मनुष्य को कितना उच्च कोटि पर होने की अपेक्षा रखती है |
प्रकृति के साथ मनुष्य का गहरा
नाता बताते हुए उन्होंने हमारी हर सुविधा को बेकार बताया यदि हम देश के लिए नहीं जी रहें हैं |
विचारों में मतभेद तो कवि ने
भी स्वीकारा है किन्तु जहाँ बात राष्ट्र धर्म की हैं वहां शेष सभी गौण है केवल
राष्ट्र सर्वोपरि है |
उदयप्रताप सिंह जी द्वारा रचित कविता महज मनोरंजन
के लिए लिखी गई कविता नहीं लगती वरन देश-काल का
अहसास करवाती है | कविता का उद्देश्य मनुष्य के भावों का परिष्कार करना,
श्रेष्ठ भावों को जगाना और मातृभूमि के प्रति अपने कर्तव्यों से रूबरू करवाना है
और कवि ने इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए
बहुत ही सुन्दर शब्दों का संग्रह कर सारगर्भित बात कही है |
आज़ादी का अर्थ मनमानी करना अथवा अपनी एक नयी दुनिया बसा कर अपने ही राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों को भुला देना नहीं हैं | समय के साथ आज़ाद देश में फिर नयी गुलामी की बेड़िया कड़ी हुई हैं | आज देश जिन बेड़ियों में जकड़ा है वो है गरीबी, भुखमरी, अन्याय, भ्रष्टाचार, आतंकवाद, व्यसन आदि | यदि हम शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता और संस्कार के प्रति अपने कर्तव्य को निभाएं तो संभव है कि मनुष्य जीवन काफी हद तक स्वस्थ, सुखी एवं संपन्न होगा | हम सभी का यह कर्तव्य है कि हम उन बेड़ियों को तोड़ने के प्रयास करें जिनने आज हमें जकड रखा है और सच्चे अर्थों में मनुष्य मात्र को स्वतंत्र करने में अपनी भागीदारी निभाएं |
आओ फिर से दिया जलाएं........
🥰🥰
ReplyDelete🥰🤩👏👏
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