प्रेम और विरह से प्रैक्टिकल होने का सफर.....
आज की इस हाय तौबा वाली जिंदगी में, शायद चाँद पर पहुँचने की जल्दी हैं हमें, और अधिक सुख और वैभव पाने की होड़/दौड़ में आदमी अपने भीतर अपने ही सर्वस्व को मिटाने की जद्दोजहद में शायद लगा पड़ा है या हो सकता है कि जानता ही नहीं वो क्या खो रहा है और क्या पा रहा है| प्रेम से अधिक महत्वपूर्ण जीवन में और कुछ भी नहीं और केवल प्रेम ही को जीवन में शायद समझता भी कोई नहीं |
रेस में रुक नहीं सकते ये प्रेशर है और दौड़ के इतने आदि हो चुके हैं हम कि रुक भी जाए तो गिल्ट खा जाए | ठहरने का अर्थ सिर्फ खोना हैं बस इतना ही जानते हैं | सृष्टि के आरम्भ से ही प्रेम एक ऐसा विषय रहा है जिसका न आदि हैं न अंत | लेकिन प्राचीन समय में ऐसा लगता है कि प्रेम की अभिव्यक्ति को मान्यता थी अथवा उसे सामान्य माना जाता था या फिर उन सब भावों का या मनुष्य मन के प्राकृतिक गुणों का महत्त्व था जो अब वैसा नहीं रह गया है | कदाचित विषय मैंने ठीक नहीं चुना हो क्योंकि प्रेम और विरह पर लिखना तो संभव ही नहीं हैं लेकिन लौकिक परिभषाओं से परे विशुद्ध प्रेम को पढ़ना मेरी अपनी रूचि है | आज के समय में कबीर और मीरा वाला प्रेम खोजना मुझे समय व्यर्थ करना नहीं लगता | कॉर्पोरेट कल्चर में जहाँ प्रति घंटे की प्रोडक्टिविटी से सबकुछ असेस किया जाता है, मुझे खाली बैठ कर खुद में खुद को खोजना भी अच्छा लगता है |
हिंदी साहित्य में प्रेम और विरह का अपना स्थान है अपना महत्त्व है | उसका भी अपना स्तर है और उसी का कुछ अंश यहाँ शेयर कर रही हूँ-
हये जाये
मनसा तिष्ठ घोरे वचांसि मिश्रा कृष्णवावहै नु।
न नौ
मंत्रा अनुदितास एते मयस्करंपरतरे चनाहन।।
अर्थात
"हे
निष्ठुर !ठहर !ठहर !आ ,हम अपनी
परस्पर दृढ़ सम्बन्ध बनाये रखने की प्रतिज्ञा को पूरी करें ,अन्यथा हमारा जीवन सुखी नहीं
रहेगा।"
भारत की नहीं विश्व की प्राचीनतम
उपलब्ध रचना ऋग्वेद है और इसके दसवें मंडल में ९५ वीं सूक्ति में उर्वशीऔर पुरुरवा का
संवाद वर्णित है जो कि विरह -वेदना की उक्तियों से भरपूर है। राजा पुरुरवा की
प्रेयसी उर्वशी किसी वात पर रुष्ट होकर उसे छोड़ कर चली जाती है। पुरुरवा उसके
विरह में पागलों की तरह उन्मत्त होकर उसे ढूंढ़ता हुआ मानसरोवर के तट पर पहुँचता
है, जहां
उर्वशी अपनी सखियों के साथ आमोद -प्रमोद में व्यस्त मिलती है। हे निष्ठुर !ठहर
!ठहर ! इन शब्दों
से अपनी बात आरम्भ करता हुआ पुरुरवा अपने विरह -व्यथित ह्रदय की दशा का अत्यंत
करुणोत्पादक वर्णन करता है :-
हये जाये
मनसा तिष्ठ घोरे वचांसि मिश्रा कृष्णवावहै नु।
न नौ
मंत्रा अनुदितास एते मयस्करंपरतरे चनाहन।।
जब उर्वशी पर पुरुरवा के इन शब्दों का कोई असर नहीं हुआ ,तो वह विरह -वेदनापूर्ण ह्रदय की अवस्था का चित्रण करता है | अंत में पुरुरवा हताश होकर कहता है:
सुदेवो
अद्य प्रपतेदनावृत्परावतं परमां गन्त्वा उ।
अर्थात
"हे उर्वशी
!तुम्हारे विना मैं जीवित नहीं रह सकूंगा। मैं किसी दूर देश में जाकर अपने शरीर को
आवरण हीन करके हिंसक पशुओं के आगे लेट जाऊंगा। बलवान भेड़िये मेरे शरीर को चीरकर
टुकड़े -टुकड़े कर देंगे। "
इसमें पुरुरवा की विरह -वेदना की अभिव्यक्ति अत्यंत प्रभावशाली शब्दों में है।
आगे चलकर रामायण और महाभारत के प्रासंगिक प्रेमाख्यान में विरह की व्यंजना अत्यंत उत्कृष्ट शैली में हुई है। विशेषतः महाभारत के राजा संवरण एवं कुमारी तप्ता के प्रणयाख्यान और नल -दमयंती -आख्यान में विरह के चारों रूपों ~~ पूर्वानुराग ,संयोग ,वियोग एवं चित्रण प्रभावोत्पादक शब्दों में मिलता है। कालिदास के कुमारसम्भव में पूर्वानुराग का चित्रण सुंदर रूप में हुआ है। उनका मेघदूत तो वियोगी हृदय का ही सन्देश है।
संस्कृत के गद्य काव्य ~~ वासवदत्ता ,दशकुमारचरित ,कादम्बरी आदि में प्रेम और विरह का
भव्य स्वरूप है। इसमें सर्वोत्कृष्ट कादम्बरी है। इसमें दो प्रेम
कथानकों को गूंथकर एक साथ उपस्थित गया है। पहले की नायिका है ~ महाश्वेता और दूसरे की कादम्बरी। दोनों
के नायक क्रमशः पुण्डरीक और चन्द्रापीड हैं, जो पूर्वानुराग की असह्य वेदना से
छटपटाकर प्राण त्याग देते हैं ,किन्तु
दोनों नायिकाएं अपने अपूर्व और तपस्या के बल पर उनके पुनर्जन्म की प्रतीक्षा करती
हुई अन्त में उन्हें प्राप्त कर लेती हैं।
हिंदी के प्रारम्भिक कवियों में महाकवि विद्यापति अपने सौंदर्य -प्रेम एवं विरह के गीतों के लिए बहुत प्रसिद्द हैं। उनके काव्य में पूर्वानुराग एवं विरह की विभिन्न अनुभूतियों का चित्रण अत्यंत मार्मिक रूप में हुआ है।
पथ गति
पेखल मो राधा !
तखनुक भाव
परान पये पीड़लि ,रहल कुमुद
निधि साधा !!
अर्थात मैंने राधा को राह के मध्य में
देखा। उसी क्षण मेरे प्राण ही घायल हो गए। उसी समय से उस कुमुद -निधि की साध बनी
हुयी है। राधा के प्रेम में कृष्ण की विह्वलता का चित्रण देखिये~~
आसायें
मन्दिर निसि गमाबए ,सूख न सूत
संयान !
जखन जतए
जाहि निहारिये ,ताहि ताहि
तोहि बहन !!
अंकुर तपन
ताप जदि जारब , कि करब
वारिद मेहे।
यह नव
जीवन विरह गमाओब ,कि करब से
पिया गेहे।।
अर्थात जब सूर्य के ताप से अंकुर जल
जायगा तो फिर मेघ की वर्षा से क्या लाभ होगा। यदि इन नवयौवन को विरह में खो दिया
तो फिर उस प्रिय के घर आने पर क्या होगा ? किन्तु दूसरी श्रेणी की प्रौढ़ा
नायिकाएं ऐसा नहीं सोचतीं। उनमें यौवन की चंचलता एवं वासना के वेग के स्थान पर
प्रणय की गंभीरता मिलती है। अतः वे पति के स्थूल मिलन की अपेक्षा ,उनके स्नेह की अधिक इक्षुक हैं:
सब कर एहु
परदेश बसि सजनी ,आयल
सुमिरि सिनेहू।
हमर एहन
पति निरदय सजनि ,नहिँ मन
बाढ़ए नेह।।
यहाँ नायिका के पति के न आने का उतना
खेद नहीं है ,जितना कि
उसके प्रेम-शून्य हो जाने का है। आगे चलकर यही नायिका अपनी विरह -वेदना की अपेक्षा
प्रिय के मंगल को अधिक महत्व देती है:
माधव हमरो
रहल दुर देश ,केओ न कहे
सखि कुशल सनेस।
जुग -जुग
जिवथु वसथु लख कोस ,हमर अभाग , हनक नहिं दोस।।
वस्तुतः यहाँ भावना का ऐसा उत्कर्ष
दिखाई पड़ता है जिनसे नायिका के अहं ,स्वार्थ एवं काम का सर्वथा विगलन हो
जाता है तथा उसका प्रणय विशुद्ध प्रेम के रूप में परिवर्तित हो जाता है।
कबीर की आत्मा, परमात्मा के मिलन के लिए उत्सुक हो
जाती है तो उसकी व्ही अवस्था हो जाती है ,जो लौकिक क्षेत्र में प्रेमी की
पूर्वानुराग में होती है यथा :
कब देखूँ
मेरे राम स्नेही ,जा बिनु
दुःख पावे मेरी देही।
हूँ तेरा
पंथ निहारूँ स्वामी, कबरे
मिलहुगे अन्तरजामी।।
आत्मा की यह मिलन आकांक्षा धीरे -धीरे
बढ़ती हुई तीव्र वेदना का रूप धारण कर लेती है। वह अपने ह्रदय के वेग पर संयम रखने
में असमर्थ हो जाती है और अपने प्रिय को पुकार -पुकार कर बुलाने लगती है -
सुखिया सब
संसार ,खाय अरू
सोवै , दुखिया
दास कबीर है ,जगे अरु
रोवै।।
सूर ने
कृष्ण और गोपियों के माध्यम से विरहानुभूतियों की व्यंजना अत्यन्त
सरस रूप में की है। वियोग की आशंका -मात्र से प्रेम - विवश गोप -बाला राधा के
ह्रदय की क्या दशा हो जाती है-
हौं
साँवरे के संग जैहौं।
होनी होइ
सु होई उभै लै यश ,अपयश काहू
न डरैहों।
कहा रिसाइ
करैगो कोऊ ,जो रोकिहै
प्राण ताहि दैहों।।
जब प्रियतम बिदा हो जाते हैं ,तो वियोगिनी बाला के ह्रदय में क्षोभ ,पश्चाताप एवं निराशा की करुण झाँकी
अवशिष्ट रह जाती है:
हरि
बिछुरत फाट्यो न हियो।
भयो कठोर
बज्र ते भारी ,रहि कैं
पापी कहा कियो।
घोरि
हलाहल सुन री सजनी ,औसर तेहि
न पियो।
मन सुधि
गई संभारित पूरी दाँव अक्रूर दियो।
कुछ न
सुहाइ गई सुधि तब ते ,भवन काज
को नेम लियो।
निशि दिन
रटत सूर के प्रभु बिनु ,मरिबो तऊ
न जात जियो।।
प्रेम - दीवानी मीरा ने अपने ह्रदय के उद्गारों को मर्मस्पर्शी शब्दों में व्यक्त किया है अपने " गिरधर गोपाल "के विरह में भावाभिभूत होकर उन्होंने शत -शत गीतों की रचना की है-
हेरि मैं
तो दरद दिवाणी होइ ,दरद न
जाणैं मेरो कोइ।
घायल की
गति घायल जाणै ,को जिण
लाई होइ।
जोहरि की
गति जौहरी जाणै ,की जिन
जौहर होइ।।
सूली ऊपर
सेज हमारी ,सोवणा किस
बिध होइ।
गगन मंडल
पै सेज पिया की ,किस बिध
मिलणा होइ।
कवियत्री महादेवी तो वेदना की साक्षात् मूर्ति ही हैं। उनके काव्य की प्रत्येक पंक्ति विरहानुभूतियों से उद्वेलित है। विरह की मधुर पीड़ा का संचार उनके जीवन में किस प्रकार हुआ-
इन ललचाई
पलकों पर ,पहरा था
जब व्रीड़ा का।
साम्राज्य
मुझे दे डाला ,उस चितवन
ने पीड़ा का।।
किन्तु अन्त में उन्होंने अपनी वेदना
पर ऐसी विजय प्राप्त कर ली है कि अब उन्हें विरह में मिलन की, दुःख में सुख की अनुभूति होने लगी है -
विरह का
युग आज दीखा ,मिलन के
लघु पल सरीखा।
दुःख सुख
में कौन तीखा ,मैं न
जानी और न सीखा।।
त्वमेवाहं, यानी तुम और मैं दोनों एक हैं।
Comments
Post a Comment