खुशी की दौड़
"हम अपने बिटिया
के 85 प्रतिशत अंक लाने पर भी दुखी हैं और इनको देखो, आज के समय में किसी के
12 वीं में 65 प्रतिशत बनने पर भी भला कोई मिठाई बांटता है क्या ?" कविता के मन में ये
केवल प्रश्न ही नहीं था अपितु राजेश की इस हरकत को उसने नादानी तक बता ड़ाला। इतने
में ही राजेश ने लाकर मिठाई का डिब्बा कविता के आगे भी कर दिया। अब तो कविता से
कैसे रहा जाता, पूछ ही लिया राजेश से।
कविता - भाईसाहब आप ये
मिठाई बेटे के पास होने की खुशी में ही बांट रहे हो या कोई और बात है?
राजेश - आपने बिल्कुल
सही कहा - मिठाई तो बेटे के पास होने की ही है, लेकिन आप इतने आश्चर्य
से क्यों पूछ रही हैं?
कविता - लेकिन उसके
बने तो 65 परसेंट ही हैं न?
राजेश - जी हाँ, मुझे खुशी है कि वह
पास हो गया और इससे भी अधिक खुशी इस बात की है कि आज के समय में जब गलत आदतें
चारों और से घेरे खडी हैं, ऐसे में वह सही मार्ग पर चल रहा है और उसका श्रेय मैं
उसके साथ अपने आप को भी देता हूं।
कविता - कैसे?
राजेश - मैंने कभी
उससे कोई शर्त नहीं रखी। वो एक घंटे पढ़ ले इसके बदले कभी उसे चॉकलेट नहीं दी, वो अच्छे नंबर ले आये
इसके बदले उसे कभी मोबाइल दिलाने की बात नहीं कही, मैंने कभी उसे नहीं
कहा कि वो अगर ठीक से पढ़ाई कर ले तो उसे मूवी दिखा दी जायेगी। इसके कारण मेरा बेटे
ने न तो मुझे कभी ब्लेकमेल करने की कोशिश की और न ही कोई शर्त रखने की। हो सकता है
इस सबसे उसके कुछ नंबर कम हो गये हों किंतु
मुझे ज्यादा नंबर और उसकी अच्छी आदतों के बीच उसकी अच्छी आदतों को चुनना अधिक
महत्व का लगा।
कविता - आपकी बात तो
सही है किंतु इन नंबरों के आधार पर वो आगे कैसे बढ़ पायेगा?
राजेश - अब समस्या
दूसरी भी तो है, मेरी आगे बढ़ने की परिभाषा भी शायद अलग है। मुझे लगता
है कुछ तो ऊपर वाले ने उसके लिए भी सोंच ही रखा होगा। मेरा मानना है कि अगर उसे
बुरी आदतों ने नहीं घेरा है और वह स्वतंत्र रूप से सोंचने की क्षमता रखता है तो
परीक्षा में नंबर लाने जैसी उपलब्धि उसके सामने बहुत बौनी है। आप मुझे यह बताइये
कि जिनके ९० प्रतिशत अथवा उससे अधिक हैं क्या वे सभी प्रकार की चुनौतियों का सामना
करने को तैयार हैं?
कविता - शायद नहीं।
किंतु समय के साथ सीख ही जायेंगे।
राजेश - मुझे भी लगता
है कि मेरा बेटा समय के साथ जितने किताबी ज्ञान की जरूरत होगी उसे सीख ही जायेगा।
खैर, मुझे जो महत्त्व का लगा उसे अपने बेटे को सीखते देख मुझे खुशी हुई मिठाई
खिलाने का मन किया इसलिये मिठाई बांट रहा हूँ। आप भी बाँटिये, कुछ तो आपकी बिटिया ने
भी हासिल किया ही होगा।
सच तो यह है कि हम एक
ऐसी दौड़ में शामिल हैं जो "रेट रेस" की भाँति है, कितना ही तेज दौड़ो
रहना फिर भी "रेट" ही है। मिठाई बाँटने जैसी खुशी तो तब ही मिल सकती है
जबकि हम श्रेष्ठता की परिभाषा समझकर उसी को पाने के लिए दौडें। श्रेष्ठतम ना भी बने
तो श्रेष्ठ तो बन ही जायेंगे।
Comments
Post a Comment