कहां है निर्मल, निर्दोष निश्छलता?
एक बालक सहज, सरल, मासूम और सच्चा, पता है क्यों होता है वो इतना अच्छा?
शायद इसलिए कि वो छल कपट नहीं जानता, वो सच और झूठ को नहीं जानता, वो अपना और पराया नहीं जानता, और शायद इसलिए भी कि वो साफ, स्वच्छ, पवित्र और निर्दोष होता है, खरा होता है। निर्मल मन और निश्छल भावों का स्वामी होता है। मगर कैसे होता वो इतना मौलिक, सारे गुणों से परिपूर्ण? क्योंकि वो संसार के विष से वाकिफ नहीं होता अर्थात उसकी सोच काम, क्रोध, मद, लोभ और मोह से प्रभावित नहीं हुई है। तो फिर कहां खो जाती हैं उसकी ये सारी विशेषताऐ, उसके ये सारे दैवीय गुण?
क्या इसलिए कि वो बङा हो जाता है? या फिर इसलिए कि वो अपने को बदल लेता है?
कहीं ऎसा तो नहीं कि उसके अपने, उसके अजीज जो खुद को बनाए नहीं रख पाए, जो इस संसार के विष में डूबे हैं वो उसकी पवित्रता को सह नहीं पाते? या फिर इसलिए कि बालक के पालनहार इतने गर्त में समा चुके कि उनका एकमात्र उद्देश्य अपने बालकों को भी अपने जैसा बनाना ही रह गया है?
क्या और कैसे समझाया जाता है लड़कियों को ऎसा कि वो अपने पिता में एक पुरूष, भाई में एक लड़का और हर पुरुष में एक अनजान अजनबी नर को देखने लगती हैं एक उम्र के बाद? बचपन की परम पवित्र निश्छलता को कैसे खत्म किया जाता है? क्यों मारना आवश्यक है उन निर्दोष भावों को?
क्योंकि कोई ऎसा था जिसे इस दैवीय सुखों से ऊपर लगा अपना क्षणिक सुख। क्योंकि किसी को मन के शुद्ध भावों से अधिक भाया तन का प्रेम।
मैं आज भी यह नहीं समझ पाई कि मर्यादा के नाम पर किसी के मौलिक गुणों का हनन आवश्यक क्यों है? किसी के निष्पाप भावों को मारना जरूरी क्यों है?
एक लड़की नजरें क्यों झुकाए किसी भी पुरूष के समक्ष यदि उसके भावों में कोई खोट ना हो? वो क्यों अपना सहज और सरल प्रेम छुपाए यदि उसकी सच्चाई पर कोई प्रश्नचिन्ह नहीं हो?
वास्तव में कारण उसकी उम्र या मर्यादा नहीं बल्कि उसके आसपास पास उपस्थित उन लोगों की कलुषित मानसिकता हैं जो उन्होंने अपने स्वार्थ के हित किए कर्मों के अनुभवों से अपनी सरलता को खोकर पाया है और वही लज्जा बनकर लड़की के चेहरे पर छा जाती है।
हमारे अपने जो वो हैं वही देखते हैं या यह कहे कि वो कुछ और देखना अथवा सोचना चाहते ही नहीं। उन्होंने जो खुद को बदल लिया वही बदलाव विरासत की भांति आगे बढाते जा रहे है।
मैंने सुना हैं बालक तो भगवान् का रूप होता है फिर भगवान् पर मनुष्य भारी कैसे पङ जाता है?
मैंने सुना नहीं खुद अनुभव किया है कि बालक को अपनी मौलिकता खोने के लिये मजबूर कर दिया जाता है उस समय जब उसकी तर्क शक्ति भी पूरी तरह विकसित नहीं हुई होती हैं। और इस तरह एक के बाद एक हम दैवीय आत्मा को नष्ट प्रायः करने का अपना कार्य बखूबी पूरा करते जाते हैं। यह सिलसिला ना जाने कब से चल रहा हैं और ना जाने कब तलक चलता रहेगा।
Lets stop killing the innocence of child, let them have their original light...
एक बालक सहज, सरल, मासूम और सच्चा, पता है क्यों होता है वो इतना अच्छा?
शायद इसलिए कि वो छल कपट नहीं जानता, वो सच और झूठ को नहीं जानता, वो अपना और पराया नहीं जानता, और शायद इसलिए भी कि वो साफ, स्वच्छ, पवित्र और निर्दोष होता है, खरा होता है। निर्मल मन और निश्छल भावों का स्वामी होता है। मगर कैसे होता वो इतना मौलिक, सारे गुणों से परिपूर्ण? क्योंकि वो संसार के विष से वाकिफ नहीं होता अर्थात उसकी सोच काम, क्रोध, मद, लोभ और मोह से प्रभावित नहीं हुई है। तो फिर कहां खो जाती हैं उसकी ये सारी विशेषताऐ, उसके ये सारे दैवीय गुण?
क्या इसलिए कि वो बङा हो जाता है? या फिर इसलिए कि वो अपने को बदल लेता है?
कहीं ऎसा तो नहीं कि उसके अपने, उसके अजीज जो खुद को बनाए नहीं रख पाए, जो इस संसार के विष में डूबे हैं वो उसकी पवित्रता को सह नहीं पाते? या फिर इसलिए कि बालक के पालनहार इतने गर्त में समा चुके कि उनका एकमात्र उद्देश्य अपने बालकों को भी अपने जैसा बनाना ही रह गया है?
क्या और कैसे समझाया जाता है लड़कियों को ऎसा कि वो अपने पिता में एक पुरूष, भाई में एक लड़का और हर पुरुष में एक अनजान अजनबी नर को देखने लगती हैं एक उम्र के बाद? बचपन की परम पवित्र निश्छलता को कैसे खत्म किया जाता है? क्यों मारना आवश्यक है उन निर्दोष भावों को?
क्योंकि कोई ऎसा था जिसे इस दैवीय सुखों से ऊपर लगा अपना क्षणिक सुख। क्योंकि किसी को मन के शुद्ध भावों से अधिक भाया तन का प्रेम।
मैं आज भी यह नहीं समझ पाई कि मर्यादा के नाम पर किसी के मौलिक गुणों का हनन आवश्यक क्यों है? किसी के निष्पाप भावों को मारना जरूरी क्यों है?
एक लड़की नजरें क्यों झुकाए किसी भी पुरूष के समक्ष यदि उसके भावों में कोई खोट ना हो? वो क्यों अपना सहज और सरल प्रेम छुपाए यदि उसकी सच्चाई पर कोई प्रश्नचिन्ह नहीं हो?
वास्तव में कारण उसकी उम्र या मर्यादा नहीं बल्कि उसके आसपास पास उपस्थित उन लोगों की कलुषित मानसिकता हैं जो उन्होंने अपने स्वार्थ के हित किए कर्मों के अनुभवों से अपनी सरलता को खोकर पाया है और वही लज्जा बनकर लड़की के चेहरे पर छा जाती है।
हमारे अपने जो वो हैं वही देखते हैं या यह कहे कि वो कुछ और देखना अथवा सोचना चाहते ही नहीं। उन्होंने जो खुद को बदल लिया वही बदलाव विरासत की भांति आगे बढाते जा रहे है।
मैंने सुना हैं बालक तो भगवान् का रूप होता है फिर भगवान् पर मनुष्य भारी कैसे पङ जाता है?
मैंने सुना नहीं खुद अनुभव किया है कि बालक को अपनी मौलिकता खोने के लिये मजबूर कर दिया जाता है उस समय जब उसकी तर्क शक्ति भी पूरी तरह विकसित नहीं हुई होती हैं। और इस तरह एक के बाद एक हम दैवीय आत्मा को नष्ट प्रायः करने का अपना कार्य बखूबी पूरा करते जाते हैं। यह सिलसिला ना जाने कब से चल रहा हैं और ना जाने कब तलक चलता रहेगा।
Lets stop killing the innocence of child, let them have their original light...
Very touching..
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