।। एक प्रार्थना।।
काश....
छोड़कर उङ जाऊ पिंजरे को
जैसे मन उङ जाता छोड़ के तन को
दूर गगन के पार
जहाँ बस हो एक ही द्वार।
काश.....
छोड़कर बन्धन भी इस तन का
सिमरू प्रभु मेरे मन मन्दिर का
दूर जगत के पार
जहाँ बस हो एक ही द्वार।
काश....
छोड़के बन्धन जीवात्मा का
तन, मन और जीवन का
दूर देह के पार
जहाँ बस हो एक ही द्वार।
काश.....
रहूँ नित तेरे मन मन्दिर में
बसु बस तेरे ही जीवन में
और कोई ना ठौर
जहां बस तू ही चारों ओर।
काश...... 

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