प्रश्न ?
समर शेष है
नहीं पाप का भागी केवल व्याघ्र
जो तटस्थ है
समय लिखेगा उसका भी अपराध।।
एक ही व्यक्ति यदि संवेदनशील नहीं रहा हो तो अधिक समस्या नहीं होती क्योंकि एक तो अपवाद होता है और अपवाद को उदहारण के तौर पर मान्यता नहीं दी जा सकती किन्तु एक समाज जब अपने असंवेदनशील होने का उदाहरण प्रस्तुत करें तो मानवता ख़तरे में ही समझी जानी चाहिए।
उज्जैन में 12 वर्षीय बच्ची के साथ हुई दरिंदगी केवल एक रिक्शा चालक की करतूत पर प्रश्न चिन्ह नहीं लगाती वरन् आठ किलोमीटर की दूरी में मिले हर उस व्यक्ति पर भी लगाती है जिसने उसे ऐसी स्थिति में देखकर नज़र अंदाज़ कर दिया जिस स्थिति में अगर स्वयं की बच्ची को देख लेते तो शायद मौत आ जाती।
प्रश्न है सभी अभिभावकों से कि वे अपने बच्चों की नैतिक शिक्षा देने में विफल क्यों हो गए, चरित्र निर्माण का दायित्व पूरा क्यों नहीं कर पाए?
प्रश्न है मिडिया से कि वे ऐसे जघन्य अपराध को इतना समय और खोखले शब्द देकर क्यों हल्ला मचाता है जबकि ऐसे सशक्त कदम नहीं उठाता कि ऐसी घटनाओं को रोका जा सके, जब तक कोई दूसरी खबर मिलेगी तब तक सहानुभूति की आड़ में यही न्यूज़ चलाई जाएगी?
शैक्षणिक जगत से प्रश्न यह है कि मानव समाज को गढ़ने की जो जिम्मेदारी उसके कन्धों पर है वो ऐसी रूग्ण पीढ़ी का निर्माण क्यों करता रहा है?
प्रशासन कहां सो रहा था?
सरकार कोई कठोर कानून बनाकर क्यों लागू नहीं कर पा रही?
और जनता से केवल इतना ही कि उसका ज़मीर कब जागेगा ?
प्रश्न अगर किया जा सके तो उज्जैन के महाकाल से भी कि क्या वो मौक़े पर मौजूद नहीं थे?
असामान्य स्थिति में जिस बच्ची को देखकर युवा संत ने अपना वस्त्र दिया वो तो उस व्यक्ति को अवश्य कर देना चाहिए था जिसने सबसे पहले उसे देखा। कहते हैं कि हर दिन सूरज एक नया दिन लेकर आता है मगर उनके लिए जो जीवित हैं। जो मुर्दा हो उन्हें दिन क्या और रात क्या।
आंकड़े ऐसा बताते हैं कि प्रति घंटा औसत चार रेप होते हैं तो हम स्वयं से इतना तो पूछें कम से कम कि क्या वास्तव में जीवित हैं या फिर 139 करोड़ की भीड़ में अधिकांश मुर्दे ही चल रहें हैं?
इस सम्पूर्ण घटना क्रम में एक जो सकारात्मक बात है वो यही है कि राहुल जी जैसे लोग भी हैं तो जिन्होंने दया, करूणा, सहायता, संवेदनशीलता और जिम्मेदारी के भाव को जीवित रखा हुआ है और यही मानवता के होने की निशानी है।
कब्रिस्तान में उन लोगों की कब्रे भी देखी जा सकती है, जिन्होंने इसलिए संघर्ष नहीं किया कि कहीं वे मारे ना जाएं और ये तादात आगे भी बढती रहेगी अगर हम जगाए ना गए |
उम्र बारह वर्ष है या इक्कीस, पांच वर्ष है या पैंतीस इससे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि हर उम्र में वो एक जीवित मनुष्य है और दुसरे सभी लोगो की तरह उसे भी जीवन जीने का अधिकार है |
क्या हम कल्पना भी कर सकते हैं कि आखिर इन बच्चियों के जीवन को ऐसे कृत्यों से किस दिशा में धकेल दिया जा रहा है?
to be continued....
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