आत्महत्या - हार या जीत

 आत्महत्या - हार या जीत 

"कोई भी माता-पिता अपने बच्चे की तुलना कभी किसी दुसरे बच्चे से ना करे " यह अंतिम स्टेटस था उस लड़की के वोट्सअप  पर |

जितनी भी तस्वीरें थी भगवान् की उसके कमरे, में वो सब मरने से पहले तोड़ दी थी उसने, ऐसा बताते हैं |

एक 18 वर्ष की होनहार छात्रा जो पढ़ाई में भी अव्वल रही और थोड़े बहुत नहीं पुरे ९४% नंबर लाती थी उसने ख़ुदकुशी कर ली | 

सुनने वालों ने अपनी अपनी प्रतिक्रिया दी | किसी ने कहा माता-पिता गलत हैं, किसी ने कहा कोई चक्कर होगा, किसी ने कहा आजकल के बच्चों को बिलकुल भी सहनशीलता नहीं है तो किसी ने कहा ठीक है अब क्या कर सकते हैं| 

कोई कुछ नहीं कर सकता क्योंकि किसी के लिए कुछ हुआ ही तो नहीं, यह तो महज एक घटना थी जो हो गई कल फिर कोई घटना होगी और कहाँ तक घटनाओं के बारे में सोचा जाए | फिर वो कौन लगती है किसी की कि उसे सोचा जाए | ये श्रीदेवी या सुशांत सिंह तो थी नहीं जिसकी मौत पर मीडिया आता, कारण खोजा जाता, या फिर खुदखुशी की वजह तलाशी जाती | यह तो एक साधारण सी लड़की थी जिसके  इस तरह मर जाने में भी कोई सोचने वाली बात शायद नहीं थी | मगर शायद सोचने वाली बात थी कि आज ४ दिनों के बाद भी अनजान अजनबी मेरे  जेहन में कहीं है |  मानवीय प्रकृति और उसके एहसास जो कभी उसे रुलाते हैं, कभी हंसाते हैं, कभी दुःख तो कभी सुख का एहसास करवाते हैं |  भीतर मरते  जाना दिखाई देने वाला नुक्सान तो नहीं होता पर खुद को भीतर ही भीतर मरते हुए महसूस करना क्या होता है वो सभी जानते हैं  क्योंकि इस दौर से सभी गुजरते हैं | 

जो प्रत्यक्ष दिखाई दिया वो उसके  शरीर का मरना है उसके मन का मरना ना जाने कितनी बार हुआ था | अगर कोई होता जो उसे समझने की कोशिश करता या कोई वो जिसके पास जाकर वो अपने भीतरी संसार का हाल कह पाती या फिर कोई वो जिसके पास जाकर वो खुद की स्तिथि बयान कर पाती | किसी से यह कह पाती की सुनो उसको वो कैसे दौर से गुजर रही है| हक़ और उम्मीद से कहती कि उसे क्या परेशान कर रहा है या कि उसे अब खुदखुशी के अलावा कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा है | किसी तरह जीने की थोड़ी सी इच्छा  बचा कर रख पाती और सहायता मांग लेती मगर इस गूंगे, बहरे और अंधे संसार में कोई था ही तो नहीं जिसे कह देती, जो समझ लेता, देख लेता  या सुन लेता क्योंकि अगर कोई होता ऐसा तो ये खबर ही ना होती | किसी को परवाह ही नहीं थी या मतलब ही नहीं था वरना इस नतीजे पर पहुँचने वाली का जीवन अस्त व्यस्त तो जरूर हुआ होगा | साथ रहने वालों को एहसास तो जरूर हुआ होगा |

अपनों को गैर होते देखा होगा उसने, खुद का अर्थ खोते हुए देखा होगा उसने, सबकुछ छिनते देखा होगा, जाते हुए देखा होगा सबकुछ, अकेले पाया होगा खुद को जीवन की लड़ाई में और जीने की वजह भी खोई होगी उसने | उम्मीद और आशा का खो जाना मर जाने जैसा ही है | संभल जाता है व्यक्ति हर स्तिथि में अगर किसी का प्यार साथ हो, किसी की तुम जरुरत हो या किसी के लिए मायने रखते हो | उस बदनसीब के हिस्से कुछ नहीं आया और उसने अपना हिस्सा और किस्सा फिर कुछ इस तरह लिख लिया अपने ही हाथों |

कायर थी, कमजोर थी, गलत थी, बेचारी थी या हिम्मत वाली पता नहीं | मगर वो थी अब नहीं है | और जिन्हें उसके होने से कोई मतलब नहीं था उन्हें उसके ना होने से तो मतलब ही क्या |

इस मानव समाज की कोई निश्चित परिभाषा नहीं है | यह मनुष्य को एक सामजिक प्राणी कहता है किन्तु वो खुदखुशी तक की यात्रा अकेले ही तय करता है | तुम खुश हो या नहीं मगर तुम्हे हंसता हुआ ही देखना चाहता है| तकलीफ बांटने से कम होती है ऐसा कहने वाला ये समाज तकलीफ को सुनना और समझना ही नहीं चाहता | तुम अधिक परेशान हो या कम ये भी यही समझदार समाज तय करता है| जिसको कोई मतलब नहीं तुमसे वो भी न्याय शास्त्र से साथ आता है तुम्हे गलत सिद्ध करने |

तुम घबरा रहे हो तो तुम्हे मजबूत रहने का ज्ञान देगा| तुम परेशान हो तो खुश रहने की सलाह देगा | सबकुछ हो सकता है यहाँ और तुम हमेशा गलत सिद्ध किये जा सकते हो अपने सोचने में, करने में, कहने में, सुनने में, शब्दों में, बातों में और जज्बातों में| एक दिन तुम खुद से अलग यह संसार बन जाते हो, वही करते हो जो ये चाहता है| Artificial हो जाते हो, झूठ हो जाते हो, औपचारिक हो जाते हो, बस केवल रह जाते हो रहने के लिए  | अर्थ सारे खो जाते हैं बस तुम सिर्फ कहने को रह जाते हो | और ऐसा बने रहना शायद बहुत कठिन होता होगा जहाँ तुम अपने मन की बात कहने से घबराते हो, अपना कुछ नहीं होते हुए भी सबकुछ के खो जाने से डरते हो | किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पाने के कारण कहीं डरे सहमे से ठहर जाते हो | ये संसार जाने कितना दूर निकल जाता है तुमसे तुम वहीं ठहरे रह जाते हो और इस तरह पीछे छुट जाते हो तुम उस दौड़ में जिसमे हर कोई दौड़ रहा होता है, शायद वो भी जिसे तुम अपने साथ रोकना चाह रहे होते हो | 

 मुरझाए हुए फूल तो ईश्वर भी स्वीकार नहीं करता फिर ये तो मानव समाज है जहाँ तुमसे वो साडी उम्मीदें है जो ईश्वर से है मगर तुम मनुष्य हो | इसलिए तुम असफल होते रहते हो मगर तुम्हारी असफलता और सफलता सब बेकार है |

भूखा जो घर के बाजू में रहता है उसे खाना मिला या नहीं कोई नहीं जानता पर दुसरे गाँव में राशन बंटवाता है | अपने घर का व्यक्ति परेशान है पर किसी को पता नहीं लेकिन शहर में क्या हो रहा है इसकी चर्चा चौपाल पर बैठकर घंटों तक करता है| मायना नहीं अगर तुम्हारा तो तुम ऐसे ही मरोगे | कभी प्राकृतिक, कभी खुदखुशी तो कभी कुछ और |

खुदखुशी के लिए बहुत हिम्मत चाहिए इसलिए वो कायर तो नहीं हो सकती | शरीर के मरने से पहले भीतर अनेकों बार मरना और किसी को खबर भी नहीं होने देना वास्तव में हिम्मत का काम है| इस तरह मरने में जो तकलीफ होती है, जो बोध होता है, जो ख़तम होता है उसके बाद शरीर रहे ना रहे शायद ही फर्क पड़ता हो| तो यह कायरता तो नहीं है पर संसार इसे गलत ही कहता है | साथ ले गई सबकुछ कह देती तो बोझ नहीं ले जाती | किसी अनजान को पकड़ कर अपनी बात कह पाटा अगर कोई तो किसी के मन में कुछ ना होता और यूँ कोई ईश्वर की तस्वीरें तोड़ कर अपना जीवन नहीं लील लेता |

जिम्मेदार कौन है ये तो पता नहीं पर उसके घर परिवार के लोग, पडौसी, सखा-साथी, शिक्षक, और वो सब जिनको ये खबर तो है कि उसने खुदखुशी की पर ये खबर नहीं हुई कि वो खुदखुशी करने वाली है |जिम्मेदार है ये सारा मानव समाज जो मानवीय संवेदनाओं के बखान तो करता है मगर उसकी समझ नहीं रखता है | जिम्मेदार है वो हर मनुष्य जो खुद को मनुष्य कहता है | 

ईश्वर ! उसे क्या कहूँ उसे तो वैसे भी क्या फर्क पड़ता है | वो सर्वव्यापक  तो एक ऐसी उम्मीद है जो टूट जाए एक बार तो फिर कहीं भी नहीं बसता है| 

आत्महत्या ना हार ना जीत बस एक कथित घटना है |


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