जो संतुलित है, वही योगी है
जो संतुलित है, वही
योगी है
सितम्बर माह की शुरुआत
ही थी और पूरा कोटा शहर बारिश में पूरी तरह भीगा हुआ था, भीगा क्या था, वास्तव में तो निचोड़ने
की स्थिति बनी हुई थी । जिधर देखो उधर पानी ही पानी । मुझे शाम के लगभग 7 बजे ट्रेन पकड़नी थी ।
चिन्ता यह नहीं थी कि मुझे ट्रेन मिलेगी या नहीं बल्कि यह थी कि ट्रेन चलेगी भी या
नहीं । उस पर आश्चर्य की बात यह थी कि जो लोग कुछ दिन पहले तक बारिश के आने के लिए
पूजा/ प्रार्थना कर रहे थे अब वे ही लोग बारिश के रूकने के लिए प्रार्थनारत दिखाई पड़
रहे थे। या तो पहले वाली प्रार्थना कुछ ज्यादा हुई होगी या फिर बाद वाली प्रार्थना
कुछ कम रह गयी होगी, जो भी हो पर परेशानी हर चेहरे पर दिखाई दे रही थी।
वास्तविकता यह है कि न तो कम से खुशी न ही ज्यादा से, खुशी तो ज्यादा और कम
के बीच में है । इस ज्यादा और कम के बीच का नाम ही है – संतुलन ।
मेरी ट्रेन समय पर
चलने की सूचना मिली, स्टेशन पहुँचने में भी कोई दिक्कत नहीं हुई । ट्रेन
जब तक रुकी रही तब तक तो बारिश ही चर्चा का विषय बनी हुई थी, शायद ये उन लोगों के
लिए जो ट्रेन पर किसी को छोडने आये होंगे और उन्हे घर पर वापस पहुँचने की चिंता
रही होगी । जैसे ही ट्रेन चली तो बारिश भले ही बंद नहीं हुई किंतु उसकी चर्चा जरूर
बंद हो गयी।
मैंने देखा, मेरे
सामने वाली सीट पर 3 लोग (थे तो 4 किंतु उनके पास मोबाईल 3 ही थे, इसलिए दो बच्चे एक साथ
बैठे हुए थे), शायद
एक ही परिवार से थे । "शायद" इसलिए क्योंकि उन्हें बातचीत करते नहीं
देखा । सभी अपने अपने मोबाईल में व्यस्त थे या मस्त थे । वैसे बड़े उपयोग की वास्तु
है मोबाईल, किंतु
तभी तक जब तक हम इसका उपयोग करें । समस्या तो तब होने लगती है जब यह हमारा उपयोग
करने लगता है । मैंने चारों और नज़रें उठा कर देखा तो कोई 2-4 को छोड़ कर बाकी सभी
अपने अपने मोबाईल में मस्त थे । मुझे लगा कहीं ऐसा तो नहीं कि मैं ही गलत हूँ
क्योंकि इतने लोग तो एक साथ गलत नहीं हो सकते । किंतु कुछ समय सोंचने के पश्चात मुझे
समझ आ गया कि यहाँ भी समस्या वही है – असंतुलन । विज्ञान का इतना बड़ा आविष्कार
खराब तो हो ही नहीं सकता, खराब तो इसका असंतुलित उपभोग है। कुछ देर में जब टिकट
चेक किया जाने लगा तब पता लगा कौन कौन लोग साथ हैं, अन्यथा अभी तक तो सभी
अपने-अपने में मस्त थे । अधिकांश लोग जो साथ थे उनके साथ होने का पता या तो उनका
टिकट एक साथ होने से लगा अथवा जब वे खाना खाने लगे तब लगा । चूंकि अधिकांश
व्यक्तियों के द्वारा एक खामोशी के नियम का पालन किया जा रहा था इसलिये जो 2-4 लोग बातचीत करना भी
चाहते वे अपवाद की भाँति ही लगते । निस्संदेह खामोशी में कोई बुराई नहीं किंतु इस
तरह की खामोशी का तो खलना स्वाभाविक है जहाँ ऐसा लग रहा हो जैसे मातम छाया हुआ है
अथवा जैसे कोई किसी को जानता ही नहीं । कारण जो भी था किंतु यहाँ भी समस्या तो
असंतुलन ही है ।
मेरा गंतव्य आ गया, जहाँ जाना था वह एक
बडा मंदिर था । मंदिर पहुंचकर देखा तो वहाँ एक पांडाल लगा हुआ था, किसी संत के साथ
सत्संग चल रहा था । लोग अपने प्रश्नों के समाधान खोजने की कोशिश कर रहे थे। इसी
बीच एक महिला का प्रश्न सुनकर मेरे पैर थम गये । महिला ने पूछा - महाराज मेरे बेटे
को खाने की बीमारी है, इसे दिन भर में खाने के अतिरिक्त कुछ और सूझता ही
नहीं । महाराज ने पूछा - और किसी की खाने से जुड़ी कोई समस्या है क्या? एक और महिला बोल पड़ी - महाराज मेरी भी समस्या खाने से
ही जुड़ी है, किंतु
मेरी समस्या यह है कि मेरा बेटा कुछ खाता ही नहीं । महाराज ने हँसते हँसते उत्तर
दिया - इन दोनों को एक घर में रख लो, कुछ हो न हो खाने की मात्रा संतुलित हो जाएगी । खैर
मैंने आगे बढते हुए सोचा - समस्या तो यहाँ भी संतुलन की ही है । मंदिर के भीतर
जाने पर श्रीमद्भगवतगीता का एक श्लोक पढा, जिसका अंतिम चरण था -
समत्वं योग उच्यते (समता ही योग है) । मुझे किसी ने कहा था कि इस मंदिर में लोगों
के प्रश्नों के उत्तर स्वतः मिल जाते हैं । मुझे भी सोचने पर उस प्रश्न का उत्तर
मिल गया जो बहुत समय से परेशान किये हुए था। किंतु मेरे लिए समत्व का अर्थ समता से
कहीं अधिक संतुलन है । जो संतुलित है, वही योगी है ।
ज्यादा व कम के बीच का नाम ही संतुलन है। 🙏🙏
ReplyDeleteWah behana aap dhanya ho pradhu.
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ReplyDeleteयोगी दृष्टि से संतुलन की पहचान
बहुत बढ़िया
अगर भीतर में संतुलन रहें तो बाहर कोई किसी प्रकार का असंतुलन नहीं होता है।
Deleteजी, बात तो भीतर के संतुलन की ही है और सदैव वही रहेगी...ये तो समझने की बात है कि भीतर के संतुलन की गहराई तक जाने के लिए कहीं से तो प्रारंभ करना होता है और मेरा मानना है कि व्यक्ति स्वयं के जीवन से जुड़े उदाहरणों से स्वयं को आसानी से जोड़ सकता है और समझ सकता है.........
ReplyDeleteशानदार 👍
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