पहचान
पहचान
अपनी पहचान, अपनी Identity हो, बस यही तो था उसका
लक्ष्य । कैसे बनेगी पहचान, यह तो वो शायद जानता भी नहीं था किंतु हमेशा एक ही
बात सोचता था - "कुछ तो ऐसा करना है कि अपनी पहचान बना सकूँ।"
अच्छे काम करने का
जज्बा ऐसा था कि कई अच्छे लोगों (महापुरुषों) की जीवनी पढ चुका था। कदाचित उसी
अध्ययन का परिणाम था कि उसकी प्रेरणा, आगे बढने का हौंसला, कुछ नया करने का ज़ज्बा
और लगन उसकी उम्र के साथ बढते ही रहे। हालांकि अच्छा काम करके जल्दी पहचान बनाना
इतना आसान नहीं होता जितना वो सोचता था। प्रसिद्धि अगर कम समय में चाहिये तो वो
कुप्रसिद्धि हो सकती है, सुप्रसिद्धि तो नहीं। ये एक अलग बात है कि उस
कुप्रसिद्धि में भी प्रसिद्धि तो छिपी हुई होती ही है। इसीलिए उसके कई
मित्र, जिन्होनें
प्रबंधन के सूत्र पढकर आगे बढने के short cuts अपना रखे थे, उसे अक्सर कहा करते -
"कुछ अलग करने के
नाम पर कुछ वैसा करो जिसे Media का attention मिले, परिणाम उसका जो भी हो, एक बार तो प्रसिद्धि
मिल ही जाएगी। फिर धीरे-धीरे Media से जुड़े लोगों से दोस्ती का फायदा मिलेगा, फिर जो करना हो वो
करते रहना।"
खैर, उसने सुनी तो सभी की
मगर अपनी धीमी गति वाला रास्ता नहीं छोडा, लेकिन Media का दामन जरूर थाम
लिया। धीरे-धीरे उसके कार्यों की गति कुछ तेज दिखाई देने लगी । काम की
तेजी का पता नहीं किंतु काम की प्रसिद्धि में तीव्रता तो दिखाई दे ही रही थी।
पहले जहाँ काम करने पर फोटो खिंचता था, अब फोटो खिंचने के लिए भी काम होने लगा, पहले काम करने पर
रिपोर्ट या खबर बनती थी, अब खबर बनाने के लिए काम होने लगा । पहले जहाँ सारा
जोर अधिक काम करने पर था, अब कम काम करके प्रसिद्धि पाने पर हो गया । यूँ लगता
था कि समय कम है और पहचान बनाने की इच्छाशक्ति अधिक।
यह कोई एक व्यक्ति
नहीं अपितु ऐसे वर्ग का प्रतिनिधित्व करने वाला भारतीय नागरिक है जो कार्यकर्ता होकर अपनी
पहचान बनाने के लिए कार्य करता है, कार्य भी गलत नहीं अपितु सुधार के ही करता है किंतु
इन अच्छे कार्य करने वालों ने अपनी पहचान को इतनी तवज्जो दे डाली कि जाने अनजाने
वे Media के हाथों की कठपुतली
बन गये। परिणामतः वही Media स्वयं को इन सबका मालिक ही समझ बैठा। चाहे वो Social Media हो, Print Media अथवा Electronic Media, उसकी औकात को वास्तविक
स्थिति से अत्यधिक ऊपर पहुँचा दिया। परिणामतः यह Media सर्वाधिकार सुरक्षित
समझ हमारे संवैधानिक सिद्धांतों तक का उल्लंघन करने को कठपुतली का खेल समझ बैठा।
हमारा संविधान इस बात पर आधारित है कि चाहे दोषी एक बार को छूट भी जाए मगर निर्दोष को सजा नहीं होनी चाहिये किन्तु इस तथाकथित Media का चरित्र इतना घटिया हो चुका है कि वह बिना जांच पडताल किये ही किसी भी
व्यक्ति के विरुद्ध कुछ भी छापने में शर्म महसूस नहीं करता और ऐसे अनेकों उदाहरण हमें
अपने आस-पास ही देखने को मिल जाएंगे। कभी-कभी तो यही Media स्वयं को न्यायपालिका से भी ऊपर मानकर ऐसे
व्यक्तियों को दोषी घोषित कर देता है जिन पर अदालत तो अभी तक कार्यवाही करने की
स्थिति में भी नहीं पहुंच पाई।
किसी गाड़ी की चोरी के
सिलसिले में पुलिस ने रामबाबू को थाने में क्या बुला लिया, Media ने रामबाबू को "अधिकारी के भेष में चोर"
कहकर प्रसिद्द कर दिया और इस Media के दबाव में पुलिस को भी अनावश्यक रूप से रामबाबू को
कुछ दिन के लिए रिमांड पर रखना पड़ा। ये अलग बात है कि रामबाबू को सच सामने लाने
में कुछ ही दिन का समय लगा, लेकिन जब सच सामने आया तो Media को उसमे कोई रुचि
नहीं रही। अब तो बेचारे रामबाबू खुद की निर्दोष कथा खुद ही सुनाते हैं और साथ ही Media द्वारा दी गई मानसिक प्रताड़ना
की चर्चा भी करते दिखाई देते हैं। ऐसे अनेकों "रामबाबू" उस मानसिक
बलात्कार के शिकार होते हैं, जो Media आये दिन करता रहता है।
इसमें ये चरित्रहीन Media तो गलत है ही, वे लोग भी कुछ हद तक
दोषी हैं जो अपनी पहचान बनाने के लिए इस गन्दगी को short cut के रूप में अपना रहे
हैं अथवा इसका सहारा ले रहे हैं।
धिक्कार है ऐसी पहचान
को और लानत है उस चरित्रहीन Media पर जो वर्षों में बनी किसी की पहचान को मिटाने में एक
दिन का समय भी नहीं लगाता।
समझ तो यह नहीं आता कि
व्यक्ति को अपनी पहचान बनाने के लिए जीना भी चाहिये अथवा नहीं, क्योंकि मौक़ा मिलते
ही यह सुप्रसिद्ध Media उस पहचान की क्या
दुर्गति करेगा, पता नहीं?
Thanks for posting this. In today's world Media is acting as Asurawtar.
ReplyDeleteIt is true that in present time media is playing with the facts without any accountability. In democracy, it is more harmful because public opinion changes with media very fast. But at last Satyamevjyate.
ReplyDeleteIt is true that in present time media is playing with the facts without any accountability. In democracy, it is more harmful because public opinion changes with media very fast. But at last Satyamevjyate.
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